बाराबंकी। निंदूरा क्षेत्र के मोहसड स्थित मतकलूपुर गांव में भागवत कथा का आयोजन किया जा रहा है। कथा के चौथे दिन सोमवार को कथावाचक वंदना शास्त्री ने श्रोताओं को गोवर्धन पर्वत की कथा सुनाई। उन्होंने बताया कि कैसे श्रीकृष्ण ने प्रकृति पूजन का महत्व समझाया।
कथा वाचक ने कहा कि एक समय ब्रजवासियों ने वर्षा के देवता इंद्र की पूजा का आयोजन किया था। उनका मानना था कि इंद्र की कृपा से अच्छी वर्षा और फसलें होंगी। परंतु श्रीकृष्ण ने लोगों को प्रकृति और अपने परिवेश की रक्षा का महत्व बताया। उन्होंने समझाया कि गोवर्धन पर्वत मवेशियों और जीवन के लिए अधिक महत्वपूर्ण है।
यह पर्वत घास, जल और अन्य प्राकृतिक संसाधन प्रदान करता है। श्रीकृष्ण के इस तर्क को सुनकर ब्रजवासी इंद्र की पूजा छोड़कर गोवर्धन पर्वत की पूजा करने लगे। इससे इंद्र क्रोधित हो गए और उन्होंने मूसलाधार वर्षा शुरू कर दी। चारों ओर पानी भर गया और लोगों का जीवन संकट में आ गया। ब्रजवासियों में भय और चिंता का माहौल छा गया था।
तब श्रीकृष्ण ने अपनी छोटी अंगुली पर गोवर्धन पर्वत को उठा लिया। उन्होंने सभी ब्रजवासियों को पर्वत के नीचे आश्रय दिया। आयोजन रामू यादव ने बताया कि भागवत कथा का समापन मंगलवार को होगा। कथा के अंतिम दिन भंडारे का आयोजन भी किया जाएगा।