गांव के अंदर पहुंचने पर आदिल काजमी अपने घर पर मिले। उन्होंने बताया कि करीब आठ पीढ़ी पहले गांव के सैयद अहमद मूसवी जियारत करने ईरान गए थे। वह वहां शिया समुदाय के रहबर बनकर रहने लगे। इन्हीं मूसवी के पोते रूहुल्लाह खुमैनी ने अपने संघर्ष से ईरान की सत्ता बदली। अब हमले में मारे गए सुप्रीम लीडर अयातुल्ला अली खामेनेई हमारे किंतूर के वंशज रूहुल्लाह खुमैनी के शिष्य थे। इनका हमारा खून का कोई रिश्ता नहीं है।
उनके पुत्र सैयद मुस्तफा हुए और 1902 में मुस्तफा के बेटे रूहुल्लाह खुमैनी हुए। उस समय ईरान पर पहलवी वंश का शासन था। खुमैनी ने इसका विरोध किया। उनके बढ़ते प्रभाव से घबराकर सरकार ने उन्हें देश से निष्कासित कर दिया, लेकिन ईरान की जनता खुमैनी के समर्थन में सड़कों पर उतर आई। हालात इतने बिगड़े कि शासक को ईरान छोड़कर भागना पड़ा।
करीब 14 साल के निर्वासन के बाद खुमैनी की ईरान वापसी हुई। वर्ष 1979 में ईरान में पहली बार इस्लामी सरकार बनी और रूहुल्लाह खुमैनी देश के पहले सुप्रीम लीडर घोषित किए गए। इसी क्रांति ने ईरान को राजशाही से मजहबी शासन की ओर मोड़ दिया। 1989 में रूहुल्लाह खुमैनी के निधन के बाद उनके शागिर्द अयातुल्ला अली खामेनेई ने सत्ता की बागडोर संभाली।