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स्वतंत्रता संग्राम सेनानी से विधायक फिर महंत बन गए काका जी

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बाराबंकी। पहले देश को आजादी दिलाने के लिए संघर्ष किया। 24 माह तक कठोर कारावास की सजा भुगती। देश को आजादी मिली तो विधायक चुने गए। क्षेत्र में ऐसे विकास कार्य किए कि वह आज भी मील के पत्थर साबित हो रहे हैं। लेकिन राजनीति से मोहभंग हुआ और सन्यास लेते हुए चित्रकूट धाम के महंत हो गए। आज भी हजारों की संख्या में इनके शिष्य मौजूद हैं। लोग इन्हें ‘काका जी’ भी कहते हैं।
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हम बात कर रहे हैं सन् 1952 में गठित पहली विधानसभा में हैदरगढ़ से विधायक रहे पंडित उमाशंकर मिश्र की। सिद्धौर ब्लॉक के ग्राम शेषपुर दामोदर में 14 जनवरी 1910 को जन्मे उमाशंकर मिश्र महात्मा गांधी से प्रभावित होकर आजादी की लड़ाई में कूद पड़े। वर्ष 1941 में अंग्रेजी हुकूमत ने व्यक्तिगत सत्याग्रह के कारण इन्हें एक वर्ष का कठोर कारावास व 100 रुपये अर्थदंड दिया गया था।
9 अगस्त 1942 को भारत छोड़ो आंदोलन में 14 माह का कठोर कारावास भी काटा। 1947 में देश आजाद होने के बाद वर्ष 1952 में जब उत्तर प्रदेश की पहली विधानसभा का गठन हुआ तो उमाशंकर हैदरगढ़ विधानसभा क्षेत्र से विधायक चुने गए। विधायक बनने के बाद उन्होंने हैदरगढ़-रामसनेहीघाट के मार्ग पर नैपुरा गांव के पास गोमती नदी पर पुल का निर्माण करवाया जो आज विकास का प्रतीक है।
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1958 में बाबा उमाशंकर का मन राजनीति से उतर गया और वह चित्रकूट चले गए। वहां पर जनसेवा के कार्यों को देखते हुए इन्हें चित्रकूट धाम के कामदगिरि तीर्थ स्थल का महंत बना दिया गया। फिर इनका नाम रखा गया प्रेम पुजारी दास। 21 अक्टूबर 1994 को इनका निधन हो गया।
इंदिरा जी का दिया ताम्र पत्र आज भी मौजूद
उमाशंकर मिश्र के पौत्र और शेषपुर गद्दी के महंत डॉ. अंजनी कुमार मिश्र बताते हैं कि बाबा उमाशंकर के सेवा समर्पण व त्याग के कारण तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी ने उन्हें सम्मानित करते हुए ताम्र पत्र भेंट किया था। यह आज भी उनके पास है।
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