बागपत में जहां माफिया मुन्ना बजरंगी की हत्या के बाद जेल में सुरक्षा की पोल खोल दी है वहीं बाराबंकी कारागार भी इससे अछूता नहीं है। पहले हुई वारदातें बता रही है कि जिला जेल सुरक्षित नहीं है। यहां क्षमता से अधिक बंदी/कैदी निरूद्व होने के साथ ही संसाधन व कर्मचारियों की कमी है जिससे किसी भी आपात स्थिति से निपटना जेल प्रशासन के लिए आसान नहीं है।
करीब दो दशक पहले जिला कारागार में तैनात एक डिप्टी जेलर पर जेल गेट के बाहर बदमाशों ने ताबड़तोड़ फायरिंग की थी। इस घटना में डिप्टी जेलर की जान बच गई थी लेकिन जेल की सुरक्षा की पोल खुल गई थी। इसके बाद वर्ष 2015 में तैनात रहे अधीक्षक अशोक सागर को गोरखपुर के शातिर बदमाश चंदन सिंह ने आवास समेत बम से उड़ाने की धमकी दी थी। इसके बाद जेल अधीक्षक की सुरक्षा बढ़ाने के साथ ही अपराधी को लखनऊ जेल भेज दिया गया था। वर्ष 2017 में तैनात रहे डिप्टी जेलर संतोष वर्मा पर उनके आवास के पास फायरिंग की गई थी हालांकि इस घटना में डिप्टी जेलर बाल-बाल बच गए थे।
वहीं जेल गेट पर ही एक व्यापारी को भी गोली मारी गई थी। करीब चार साल पहले जिला जेल में निरूद्व रहे शातिर बदमाश संजीव माहेश्वरी उर्फ जीवा का भी नाम कई अपराधिक वारदातों में सामने आया था। इन सभी मामलों के बाद जेल की सुरक्षा बढ़ाते हुए यहां सीसीटीवी कैमरे व मुख्य गेट पर मेटल डिटेक्टर लगाया गया है। जेल में बनी 18 बैरकों में जहां करीब आठ सौ बंदी, कैदी रखने की क्षमता है वहीं इस समय 1250 निरूद्व है। जबकि जेल में पांच डिप्टी जेलर के पद के सापेक्ष दो डिप्टी जेलर व एक जेलर तैनात है। इसके साथ बंदी रक्षकों की भी कमी है।