बाराबंकी। पति पर दहेज उत्पीड़न के साथ नपुंसक होने का आरोप लगाकर मायके गई पत्नी के गुजारा भत्ता के दायर वाद को पारिवारिक न्यायालय ने खारिज कर दिया है। अपर प्रधान न्यायाधीश द्वितीय कृष्ण कुमार की कोर्ट ने माना कि महिला यह मुकदमा भरण-पोषण के लिए नहीं बल्कि पर्याप्त रुपये लेकर अलग होने के लिए लड़ रही है।
शहर में घंटाघर से पूरब दिशा के एक मोहल्ला में रहने वाली युवती का विवाह घंटाघर के पश्चिम स्थित एक मोहल्ला के रहने वाले युवक के साथ 23 जनवरी 2020 को हुआ था। युवती ने पांच अगस्त 2021 को फैमिली कोर्ट में पति से प्रतिमाह 20 हजार रुपये भरण-पोषण भत्ता दिलाने की मांग का वाद दायर किया था। आरोप था कि दहेज में दो लाख रुपये न देने पर पति, सास व देवर उसे प्रताड़ित करते हैं। विवाह के पांच माह बाद रक्षा बंधन को रुपये मांगे और न देने पर मारपीट कर भगा दिया। इसके बाद सुलह न हो पाने के कारण वह मायके में रहने लगी।
आवेदन पत्र में युवती ने पति पर शारीरिक रूप से सुख न दे पाने का आरोप भी लगाया। इसके जवाब में पति ने अपने पुरुषत्व की जांच कराए जाने की मांग कोर्ट से की थी। कोर्ट ने सीएमओ को मेडिकल टीम बनाकर जांच के लिए निर्देशित किया। सीएमओ ने केस को केजीएमयू लखनऊ रेफर कर दिया। वहां से केस को दिल्ली के एक चिकित्सा संस्थान में भेज दिया गया। तब पति ने अपनी आर्थिक स्थिति ठीक न होने का हवाला देते हुए दिल्ली में जा कर जांच कराने में असमर्थता जताई थी।
22 दिसंबर 2023 को जिरह के दौरान युवती ने कोर्ट में कहा कि अगर उसे आठ लाख रुपये व दहेज का सामान वापस मिल जाए तो वह सुलह कर लेगी। कोर्ट ने इस बयान को भी गंभीरता से लिया और गुजारे भत्ते का दावा खारिज कर दिया। कोर्ट ने अपने आदेश में कहा कि महिला यह मुकदमा भरण-पोषण के लिए नहीं बल्कि पर्याप्त रुपये लेकर अलग होने के लिए लड़ रही है। इस मामले में दहेज उत्पीड़न एक्ट के दुरुपयोग की बात सामने आने पर ही गुजारा भत्ते की याचिका को खारिज किया जाता है।