भारत-नेपाल सीमा के निकट मणिपुर में रविवार को लगने वाला साप्ताहिक बाजार अब स्थानीय विकास और रोजगार का मजबूत आधार बन गया है। सीमावर्ती क्षेत्रों में व्यापारिक गतिविधियों को बढ़ावा देने का असर अब जमीनी स्तर पर दिखने लगा है। तराई और जंगली क्षेत्र के सैकड़ों लोग इस बाजार से जुड़कर अपनी जरूरतें पूरी कर रहे हैं। आर्थिक रूप से आत्मनिर्भर भी बन रहे हैं। अब जरूरत भंसार सीमा वृद्धि की है।
''''तरक्की का द्वार'''' अभियान का लक्ष्य सीमावर्ती इलाकों में व्यापारिक अवसरों को बढ़ाना है, ताकि लोगों को पलायन न करना पड़े। हरैया-सतघरवा का यह साप्ताहिक बाजार इस अभियान की सफलता की मिसाल बन चुका है। मणिपुर साप्ताहिक बाजार में भारत के साथ-साथ नेपाल से भी बड़ी संख्या में खरीदार और व्यापारी आते हैं। दोनों देशों के बीच दशकों पुराना रोटी-बेटी का रिश्ता इस बाजार में आज भी जीवंत है।
नेपाल निवासी रोनित कांछा ने बताया कि जब नेपाल में आंदोलन हुआ था और सीमाएं बंद हो गई थीं, तब भारत न आने की मनाही से बहुत परेशानी हुई थी। अब कोई दिक्कत नहीं है। हम लोग फिर से पहले की तरह खरीदारी के लिए आते हैं। इस बाजार ने दोनों देशों के लोगों को फिर से जोड़ा है। सीमा क्षेत्र के छोटे किसान अपनी उपज लेकर बाजार में पहुंचते हैं और सब्जियों को उचित दाम पर बेचते हैं। सद्दाम अली ने बताया कि खेत की हरी सब्जियां यहां अच्छे दामों में बिक जाती हैं, जिससे परिवार की आमदनी बढ़ जाती है। पहले जहां सब्जियां गांव में सस्ती बिकती थीं, अब बाजार में बेहतर भाव मिलने से खेती फिर से लाभदायक होती दिख रही है।
स्थानीय दुकानदारों की बढ़ी आय, बाजार में आई रौनक
गंधैला नाका के आकाश और राजेश ने बताया कि वे किराने की दुकान चलाते हैं और मणिपुर बाजार से थोक में सामान लाकर यहां बेचते हैं। नेपाल और भारत दोनों ओर से खरीदारों के आने से आमदनी बढ़ी है। दुकानदार काली प्रसाद का कहना है कि बाजार के दिन उनके यहां ग्राहकों की लाइन लगी रहती है। उन्होंने मुस्कुराते हुए कहा कि नेपाल से लोग आ रहे हैं, तो व्यापार में जान आ गई है।
महिलाओं को मिला सहारा, घर बैठे पूरी हो रही जरूरत
-संगीता देवी ने बताया कि उनके परिवार के सदस्य बाहर मजदूरी करते हैं। पहले घर का सामान लाने में दिक्कत होती थी। अब साप्ताहिक बाजार लगने से सारा सामान घर के पास ही उचित दर पर मिल जाता है। उन्होंने कहा कि अब हमें बाहर बाजार नहीं जाना पड़ता, यहां हर जरूरत की चीजें मिल जाती हैं। जगदीश प्रसाद कसौधन कहते हैं कि बाजार लगने से स्थानीय युवाओं को घर के पास ही रोजगार मिल रहा है। कोई सब्जी बेच रहा है, कोई दुकान लगा रहा है, तो कोई परिवहन सेवा से जुड़ा हुआ है।