बाराबंकी रेलवे स्टेशन, रात 9:30 बजे...आरपीएफ पोस्ट के बाहर पांच साल की हिमांशी अपनी ढाई माह की बहन को गोद में लिए बार-बार एक ही सवाल पूछ रही थी ....मम्मी-पापा कब आएंगे...? उसे नहीं पता था कि कुछ ही मिनट पहले उसके सामने उसकी दुनिया बिखर चुकी है। पास ही चार साल की मीठी रोते-रोते इतनी थक गई कि आरपीएफ पोस्ट के फर्श पर ही सो गई। ढाई माह की मासूम बच्ची बुखार से तप रही थी और लगातार रो रही थी। उसे चुप कराने के लिए एक महिला पुलिसकर्मी उसे गोद में लेकर दुलार रही थी। वह कभी बच्चे को संभालती तो कभी हिमांशी को समझाने की कोशिश करती, लेकिन मासूम बच्ची की नजरें बार-बार स्टेशन की तरफ उठ जाती थीं।
आरपीएफ पोस्ट पर मौजूद हर शख्स की आंखें नम थीं। बच्चों की बेबसी देखकर पुलिसकर्मी भी भावुक हो उठे। संवाद न्यूज एजेंसी के प्रतिनिधि ने बच्चों की हालत की जानकारी सीएमओ डॉ. रंजन गौतम को दी। बच्चों के स्वास्थ्य परीक्षण और जरूरी चिकित्सकीय सहायता की व्यवस्था के निर्देश दिए गए। रात गहराती जा रही थी, लेकिन हिमांशी का इंतजार खत्म नहीं हो रहा था। वह बार-बार कह रही थी.. मेरी मम्मी-पापा को बुला दो...।