बाराबंकी। माती पुलिस चौकी फूंकने, तोड़फोड़ और पुलिसकर्मियों पर जानलेवा हमले में 11 साल बाद आए इस फैसले ने उस दिन की भयावह तस्वीर फिर ताजा कर दी है। देवा कोतवाली के लॉकअप में युवक की मौत के बाद उग्र भीड़ ने जिस तरह पुलिस चौकी पर हमला बोलकर आग लगा दी थी, वह घटना आज भी जिले के सबसे चर्चित घटनाओं में गिनी जाती है। अब इसी मामले में अदालत ने 22 लोगों को दोषी ठहराते हुए सजा सुनाई है।
यह पूरा घटनाक्रम सुभाष राजवंशी की मौत से शुरू हुआ था। मूल रूप से लखनऊ के मड़ियांव निवासी सुभाष देवा के सरसौंदी स्थित अपने ननिहाल में रह रहा था।
29 अगस्त 2015 को बाइक चोरी के आरोप में देवा पुलिस ने हिरासत में लिया था। 30 अगस्त की शाम उसने देवा कोतवाली के लॉकअप में अपनी शर्ट का फंदा लगाकर आत्महत्या कर लिया था। पोस्टमार्टम के बाद पुलिस 31 अगस्त की सुबह शव को उसके सौतेले पिता और मामा के साथ लखनऊ ले गई और वहीं पर भैंसाकुंड में अंतिम संस्कार करा दिया।
यहीं से हालात बिगड़ने शुरू हुए। ननिहाल पक्ष और गांव के लोग शव गांव लाने की मांग कर रहे थे, लेकिन पुलिस ने इसकी अनुमति नहीं दी।
आरोप लगा कि पुलिस ने ग्रामीणों की इच्छा के विरुद्ध जल्दबाजी में अंतिम संस्कार करा दिया। इस बात से ग्रामीणों में जबरदस्त आक्रोश फैल गया। देखते ही देखते आसपास के करीब छह गांवों के लोग इकट्ठा हो गए।
दोपहर करीब 12 बजे महिलाओं समेत करीब 150 लोगों की भीड़ लाठी-डंडों के साथ माती चौकी पहुंच गए। चौकी पर उस समय बेहद कम पुलिस बल मौजूद था।
उग्र भीड़ ने चौकी में घुसकर पुलिस कर्मियों को पीटना शुरू कर दिया। कई सिपाहियों को जान बचाकर खेतों की ओर भागना पड़ा। इसके बाद भीड़ ने चौकी में जमकर तोड़फोड़ की और आग लगा दी। इसमें तत्कालीन देवा कोतवाल मनोज पंत समेत पांच पुलिसकर्मी घायल हो गए थे।
तत्कालीन डीएम ने संभाला था मोर्चा : इसके बाद तत्कालीन डीएम योगेश्वर राम मिश्र ने स्वयं पुलिस की अगुवाई की। एसपी अब्दुल हमीद लखनऊ से सीधे मौके पर पहुंचे। डीएम स्वयं डंडा लेकर चौकी के बाहर खड़े हुए थे। उनकी अगुवाई में पुलिस ने हालात नियंत्रित किए थे।