बाराबंकी। पांच नेशनल हाईवे व चार हजार किमी लंबी सड़कों वाले बाराबंकी जिले में सड़क हादसे में हर 20 से 21 घंटे में एक व्यक्ति की जान जा रही है। हादसे रोकना प्राथमिकता है, मगर हादसे में घायल लोगाें को तुंरत इलाज देना भी उतना ही जरूरी है। मगर अफसोसजनक बात यह है कि जिले में गंभीर रूप से घायलों के इलाज की व्यवस्था ही नहीं है। ऐसे में हर माह 10 से 12 लोगों की मौत इलाज के अभाव व देरी से हाे रही है।
लखनऊ-अयोध्या हाईवे पर सड़क हादसों में घायल होने वालों को सीएचसी रामसनेहीघाट या जिला अस्पताल लाया जाता है। पुलिस या एंबुलेंस तुरंत पहुंचती, तब भी कम से कम 45 मिनट लग जाते हैं। जिला अस्पताल के ट्राॅमा सेंटर में पहुंचने पर यदि गंभीर रूप से घायल है तो सर्जन को ऑन काॅल बुलाया जाता है। कई बार तो सर्जन आ ही नहीं पाते। जबकि ट्राॅमा में सर्जन का पद ही खाली है। सिर में चोट है तो कोई इलाज ही नहीं, क्योंकि न्यूरो का कोई डॉक्टर नहीं है। हृदय की धड़कनों को नियंत्रित करने के लिए हृदय रोग का डॉक्टर भी नहीं है। मामला गंभीर है तो एंबुलेंस को काॅल करके बुलाने पर रेफर होने में कम से कम आधा घंटा लगता है। जाम में फंसते हुए एंबुलेंस केजीएमयू लखनऊ पहुंचने में एक से डेढ़ घंटे लगा देती है।
पूर्वांचल एक्सप्रेसवे व लखनऊ-सुल्तानपुर हाईवे के घायलाें को सीएचसी हैदरगढ़ लाया जाता है। लेकिन यहां न्यूरो सर्जन छोड़िए, सामान्य सर्जन तक नहीं मिलता। प्राथमिक इलाज व रेफर करने में अक्सर आधा घंटा लगता है। घायल व्यक्ति को करीब 63 किमी दूर केजीएमयू लखनऊ भेजा जाता है। कम से कम डेढ़ घंटा लग जाता है। सड़क हादसा निंदूरा, फतेहपुर, टिकैतनगर, असंद्रा, बनीकोडर, सुबेहा, मोहम्मदपुर खाला, रामनगर या बड्डूपुर क्षेत्र में हुआ है तो गंभीर रूप से घायल लोगों को समय पर इलाज मिलना मुश्किल है।
महत्वपूर्ण है गोल्डन ऑवर
किसी भी गंभीर परिस्थिति में मरीज के लिए दुर्घटना के बाद का एक घंटा बेहद अहम होता है। इस समय में दिया गया इलाज उसकी जिंदगी को बचाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है। इसलिए इसे गोल्डन ऑवर कहा जाता है।
सीएचसी, जिला अस्पताल, फिर लखनऊ, चली गई जान
तीन मार्च को टिकैतनगर थाना क्षेत्र में करीब पौने 12 बजे पोस्टमैन आशीष कुमार की बाइक में कार ने टक्कर मार दी। उसके खून बह रहा था। उसे टिकैतनगर सीएचसी से जिला अस्पताल, फिर यहां से लखनऊ रेफर किया गया, जहां उसकी मौत हो गई।
दो घंटे बाद लगाया गया जिला अस्पताल, हो गई मौत
एक फरवरी को फतेहपुर कोतवाली क्षेत्र में युगांतर विद्यालय के निकट बाइक की टक्कर से मैदासपुर निवासी शांति देवी व उनका पुत्र घायल हो गया। एक घंटे बाद सीएचसी, फिर यहां से करीब दो घंटे बाद जिला अस्पताल लाया गया, मगर शांति की मौत हो गई।
मौके पर ही दो घंटे पड़े रहे बेहोश
आठ फरवरी को लखनऊ-सुल्तानपुर हाईवे पर लोनीकटरा थाना क्षेत्र में अज्ञात वाहन की टक्कर से लदई का पुरवा गांव निवासी शैलेश व इनका दोस्त घायल होकर बेहोश हो गए। दो घंटे बाद दोनों को अस्पताल भेजा गया, जहां शैलेश की मौत हो गई।
हाईवे पर ही होना चाहिए ट्राॅमा सेंटर
ट्रॉमा सेंटर की सुविधा हाईवे पर ही होनी चाहिए। लखनऊ-अयोध्या, बाराबंकी-बहराइच हाईवे, पूर्वांचल एक्सप्रेसवे के लिए कम से कम 500-500 बेड के ट्राॅमा सेंटर व अस्पताल हों। न्यूरो व कार्डियो सर्जन की सुविधा मिले।
- डॉ. ब्रजेश कुमार, सीएमएस, जिला अस्पताल