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कैंसर पीड़ित फूला की बदौलत फल-फूल रही हैं महिलाएं

Sat, 07 Mar 2015 11:23 PM IST
ब्यूरो/अमर उजाला, बांदा
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हौसला हो तो दूभर जिंदगी भी आसान हो जाती है। इसके साथ कुछ कर गुजरने का जज्बा हो तो सोने पे सुहागा। लीवर कैंसर से जूझ रही 48 वर्षीय फूला देवी ऐसी ही बानगी है।
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आर्थिक तंगहाली कैंसर के इलाज में रोड़ा बनी हुई है। फूला गांव की तमाम महिलाओं के लिए ‘देवी’ साबित हो रही है। अब तक बिना किसी सरकारी या गैर सरकारी संगठन की मदद के तीन दर्जन से ज्यादा अपने गांव की महिलाओं को साक्षर कर दिया है। घरेलू कामकाजी महिलाओं का समूह बनाकर उन्हें बचत और जमा करने की राह दिखाई है।

यह बात और है कि  फूला को कैंसर के इलाज के लिए कोई जनप्रतिनिधि अपनी निधि से मदद देने की सुध नहीं ले रहा बांदा शहर से मात्र पांच किलोमीटर दूर बड़ोखर खुर्द गांवों में फूला देवी तमाम महिलाओं के लिए उदाहरण बनी हुईं हैं।
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साधारण परिवार में जन्मी फूला बचपन से ही परेशानियों में उलझ गई। नासमझ थी तभी पिता का देहांत हो गया। ननिहाल में रहकर आठवीं कक्षा तक पढ़ाई की। फिर घर वालों ने शादी कर दी। ससुराल में पति की आर्थिक स्थिति भी अच्छी नहीं थी। आगे पढ़ाई करने के लिए पति तो राजी हो गया पर ससुर ने रोक लगा दी।

पति गांव के बड़े काश्तकारों के मवेशी चराते थे। जुगाड़ करके फूला ने एक भैंस खरीद ली। उसका दूध बेचकर कुछ दिनों में एक और भैंस खरीद ली। दो भैंसों के दूध से उनके घर की गाड़ी चलने लगी। कुछ वक्त के बाद पांच बीघा जमीन भी खरीद ली, लेकिन कुदरत ने शायद फूला को फलने-फूलने की मुद्दत काफी सीमित रखी थी।

कुछ दिन बाद उसके लीवर में कैंसर हो गया। मुंबई के टाटा मेमोरियल में इलाज शुरू हुआ तो खेती की जमीन और भैंस भी बिक गई। अब फूला और उसका पति फिर पुराने हालात पर लौट आए, लेकिन जानलेवा मर्ज की गिरफ्त में आने के बाद फूला का हौसला टूटा नहीं।

अपने जीवन को उद्देश्यपरक बनाते हुए उसने गांव की महिलाओं को संवारने की मुहिम छेड़ दी है। बगैर किसी मदद या शोहरत के फूला देवी गांव की अनपढ़ महिलाआें को पिछले करीब एक वर्ष से अपने घर में कक्षा लगाकर साक्षर बनाने के मिशन मेें जुटी है। करीब 35 महिलाओं ने अपने हस्ताक्षर बनाना सीखने के साथ ही पहाड़ा, गिनती भी सीख लिया है।

फूला देवी ने 35 महिलाओं को जोड़कर महिला समूह बनाया है। यह सभी महिलाएं 20 रुपये प्रतिमाह जमा कर रही हैं। समूह के नाम बैंक में खाता खोलकर हर माह यह पैसा जमा किया जा रहा है। एक सुविधादाता ने इन महिलाओं के समूह को स्वर्ण जयंती समूह से जोड़ दिया है।

नतीजे में समूह से जुड़ी 24 महिलाओं को भैंस पालन के किए बैंक से 25-25 हजार रुपये मिल गए। दूसरे चरण में फिर बैंक ने 24 महिलाओं को भैंस पालन के 24-24 हजार रुपये दिए। अब यह आधा सैकड़ा महिलाएं भैंस पालकर अपनी गृहस्थी चला रही हैं। आत्मनिर्भर बनने वाले यह महिलाएं फूला देवी को श्रेय देती हैं।

‘संस्कृति कॉलेज’ खोलने की तमन्ना
फूला का कहना है कि उसे पता है कि वह कभी भी उसे इस संसार से विदा हो सकती है लेकिन इससे बेपरवाह होकर वह दूसरों का जीवन संवारने में लगी हुई है। फूला की तमन्ना है कि वह अपने गांव में ‘संस्कृति कॉलेज’ खोले, जिसमें युवा-युवतियों को भारतीय संस्कृति की जीवन शैली के प्रति प्रेरित कर सके।

सौतन को छोटी बहन जैसा स्नेह
फूला देवी बताती है कि शादी के बाद उसके कोई संतान नहीं हो रही थी। उसने अपने पति को दूसरी शादी करने को कहा। बमुश्किल पति राजी हुआ। पति ने दूसरी शादी कर ली। दूसरी पत्नी से दो पुत्र और दो पुत्रियां हुईं। कुदरत का कुछ खेल ऐसा रहा कि इस बीच फूला देवी ने भी एक पुत्री को जन्म दिया।

खास बात यह कि फूला पति की दूसरी पत्नी को हरगिज सौतन मानती। बल्कि दोनों पत्नियां के बीच छोटी-बड़ी बहन जैसा स्नेह है। दूसरी पत्नी के बच्चे फूला को ‘बड़ी मां’ कहकर पुकारते हैं।
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