महिलाएं हमेशा पुरुषों से आगे रहीं, लेकिन इसे कभी स्वीकार नहीं किया गया । आधुनिक व नए आर्थिक परिदृश्य में महिलाओं की स्थिति में परिवर्तन आया है। ‘नए भारत में महिलाओं की भूमिका’ पर आयोजित राष्ट्रीय संगोष्ठी में यह चर्चा हुई। इसका आयोजन सामाजिक अनुसंधान परिषद (आईसीएसएसआर) के तहत हुआ।
शनिवार को राजकीय महिला स्नातकोत्तर महाविद्यालय के समाजशास्त्र विभाग द्वारा आयोजित दो दिवसीय बौद्धिक राष्ट्रीय संगोष्ठी में जेएनयू, नई दिल्ली के प्रो. अनिल कुमार सिंह (ग्रीक स्टडी चेयर) ने कहा कि महिलाएं समाज का केंद्र बिंदु हैं, लेकिन पुरुष प्रधान समाज ने इसे हमेशा नकारा है। प्रो. सत्येंद्र सिंह ने कहा कि बदलते माहौल में महिलाओं का रुतबा बढ़ा है। पुरुष भी अब इसे स्वीकार रहे हैं। डॉ. शबाना रफीक ने कविता के जरिये भारतीय नारी के व्यक्तित्व और पक्ष को रखा। दूरदराज के विश्वविद्यालयों व महाविद्यालयों के उपस्थित प्रवक्ताओं ने शोधपत्र पेश किए।
गोष्ठी दो सत्रों में हुई। प्रथम तकनीकी और द्वितीय विशेषज्ञ सत्र में बुद्धिजीवियों ने महिलाओं के उत्थान पर विचार व्यक्त किए। कृषि विश्वविद्यालय कुलपति प्रो. यूएस गौतम, निदेशक डा. एनके वाजपेयी, राजकीय महाविद्यालय, महोबा प्राचार्य डा. सुशील बाबू, राजकीय मॉडल कालेज, पिपरहरी प्राचार्य डा. विनोद कुमार समेत मेजबान महाविद्यालय प्राचार्य डा. बालकृष्ण पांडेय, संयोजक डा. सबीहा रहमानी, आयोजन सचिव डा. पंकज सिंह, डा. जितेंद्र कुमार, डा. माया वर्मा आदि ने भी संबोधित किया।
शुरुआत दीप प्रज्जवलन और सरस्वती चित्र पर माल्यार्पण से हुई। डा. शशि भूषण मिश्र ने बताया कि राष्ट्रीय संगोष्ठी का समापन रविवार को होगा। इस अवसर पर रजनी भार्गव, डा. राजनारायण सिंह, डा. दीपाली गुप्ता, डा. अंकिता तिवारी, डा. सपना सिंह, डा. जय प्रकाश सिंह, डा. जेबा खान, डा. जयकुमार चौरसिया, डा. विनोद सिंह चंदेल व छात्राएं आदि शामिल रहीं।