फ्री ई-पेपर
पर्सनलाइज़्ड फ़ीड
पर्सनलाइज़्ड नोटिफ़िकेशन
चलते-फिरते ख़बरें
लॉयल्टी रिवॉर्ड्स
विज्ञापन

Banda News: उलेमाओं ने संभाली कमान तो मुस्लिमों ने खूब किया मतदान

विज्ञापन
विज्ञापन
बांदा। 18वीं लोकसभा के लिए हुए आम चुनाव में उत्तर प्रदेश के नतीजों के बाद चल रही चर्चाओं में खासकर मुस्लिम मतदाता मुद्दा बने हैं। कहा जा रहा है कि यह पहला मौका है जब बगैर किसी बिखराव या टकराव के खामोशी से बड़े पैमाने पर मुस्लिमों ने वोट डाले।
विज्ञापन

इस सच्चाई की तह में मुस्लिमों पर पकड़ और असर रखने वाले मुस्लिम उलेमा और रहनुमा हैं, जिन्होंने शायद पहली बार खुद आगे आकर मोर्चा संभाला और सधे ढंग से इसकी मुहिम चलाई। विश्वविख्यात इस्लामी शिक्षा केंद्र देवबंद और बरेली से लेकर मुंबई व दीगर मुकामों के उलेमाओं ने मतदान को ‘शरई फरीज़ा’ करार देते हुए मुस्लिम मतदाताओं से हर हाल में वोट डालने की अपीलें कीं। यहां तक कहा था कि जो मुसलमान वोट नहीं डालेगा वो ‘गुनाहगार’ होगा।

मुसलमानों के बड़े तबके पर प्रभाव रखने दारुल उलूम देवबंद के इस्लामी विद्वान मौलाना सज्जाद नोमानी ने अपने बयानों और सोशल मीडिया के जरिए जारी किए संदेशों में मुस्लिम मतदाताओं को हर हाल में और मौसम की परवाह किए बगैर वोट डालने की सख़्त ताकीद की थी। उन्होंने इसे ‘शरई फरीजा’ (शरीयत का फर्ज) बताया था। मौलाना नोमानी का यह संदेश खासकर यूपी के हर शहर और जिले में गुपचुप ढंग से खूब फैलाया गया।
विज्ञापन

उनकी ऑडियो और वीडियो माइक से सुनवाई व दिखाई गई। इसी तरह मुसलमानों में काफी शोहरत रखने वाले मौलाना सैय्यद तलहा कासमी (मुंबई) ने वीडियो मैसेज के जरिए यह तक कहा कि वोट न डालने वाला मुसलमान ‘गुनाहगार’ होगा। इन धर्म गुरुओं के अलावा जमीअत उलमाए हिंद वगैरा के मुस्लिम रहनुमाओं ने भी सोशल मीडिया और अन्य उपायों से मुस्लिमों को अबकी वोट जरूर डालने का पैगाम पहुंचाया। खास बात यह कि इन किसी उलेमा या रहनुमा ने अपने संदेशों में किसी सियासी दल विशेष का नाम नहीं लिया कि किसे वोट दें। सिर्फ मतदान पर जोर दिया। दलील दी कि चुनाव आयोग भी ज्यादा मतदान पर जोर दे रहा है।
धर्म गुरुओं की यह मुहिम रंग लाई। शिद्दत की जानलेवा गर्मी व लू की परवाह किए बगैर मुस्लिम मर्द व औरतों ने अपने बूथों पर जाकर जमकर मतदान किया। मुस्लिम आबादी वाले बूथों पर 70 से 80 फीसदी तक वोट पड़े। इसका सीधा फायदा कांग्रेस-सपा गठबंधन को मिला। यह भी देखने में आया कि मुस्लिम मतदाताओं ने अपने वोट को लेकर मुस्लिम नेताओं को भी खास तवज्जो नहीं दी। उन पर सिर्फ उलेमाओं की अपील सिर चढ़कर बोली। हालांकि मुस्लिम नेता अपनी पीठ खुद थपथपा रहे हैं।
विज्ञापन
विज्ञापन
Next
AU ऐप में पढ़ें