स्वच्छ भारत मिशन के तहत शौचालय निर्माण व जागरुकता में करोड़ों रुपये ठिकाने लग गए। शहर की सीवर पाइप लाइन योजना का काम 37 साल बीत जाने के बाद भी अधूरी पड़ी है। इसके निर्माण में करीब ढाई करोड़ रुपये खर्च हो चुके हैं, लेकिन पहले चरण की योजना ही चालू नहीं हो सकी। कई बार जांच हुई। इस्टीमेट बना, लेकिन नतीजा वही ढाक के तीन पात जैसा रहा।
चार दशक पूर्व शुरू हुई योजना की लागत 90.64 लाख रुपये थी। अब लागत बढ़कर 62.45 करोड़ रुपये पहुंच गई है। केंद्र सरकार से परियोजना को 1979 में स्वीकृति मिली थी। निर्माण का दायित्व जल निगम 16वीं शाखा को दिया गया था।
1982 में शुरू हुआ काम तीन चरणों में वर्ष 1990 में पूरा होना था, लेकिन इस योजना में आज तक 50 फीसदी काम भी पूरा नहीं हुआ। विभाग बार-बार संशोधित बजट शासन को भेजता रहा।
पैसा भी आया लेकिन योजना पूरी नहीं हुई। आलम यह है कि इतने लंबे अंतराल के बावजूद प्रथम चरण का ही काम पूरा नहीं हो सका। अब जल निगम को योजना पूरी करने के लिए लगभग 62 करोड़ बजट की दरकार है।
सीवर योजना के तहत कई साल पूर्व कैलाशपुरी, कटरा, बाकरगंज, कंचन पुरवा, छाबी तालाब, बलखंडी नाका, नुनिया मोहाल, पदमाकर चौराहा, जेल रोड आदि में पाइप लाइन बिछाई गई थी।
कर्बला रोड मानिक कुइयां के पास बनाया गया पंपिंग स्टेशन व पाइप लाइन ध्वस्त पड़ी है। शहर के करीब पांच किलोमीटर दूर कनवारा रोड में बना ऑक्सीडेशन पाउंड और ट्रीटमेंट प्लांट भी जर्जर और जंगल में तब्दील हो गया है।
जल निगम 16वीं शाखा के अधिशासी अभियंता अंचल कुमार का कहना है सीवर योजना के लिए वर्ष 2005 से कोई बजट नहीं मिला है। वर्ष 2018-19 में योजना को अमृत योजना में समाहित कर दिया गया है। इसके लिए 62 करोड़ का संशोधित बजट केंद्र सरकार को भेजा गया है। बजट स्वीकृत होते ही कार्य शुरू हो जाएगा।
सीवर प्लांट अब एनजीटी (नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल) द्वारा निर्धारित मानकों के मुताबिक बनेगा। ट्रीटमेंट प्लांट नई टेक्नालॉजी का होगा। बांदा सीवर का ट्रीटमेंट प्लांट नौ एमएलडी क्षमता का होगा। इसकी लागत करीब 22.26 करोड़ होगी। शेष बजट 13 किलोमीटर पाइप लाइन बिछाने और कनेक्शन आदि में खर्च किए जाएंगे।
सीवर पाइप लाइन योजना का प्रथम चरण फ्लाप होने के बाद विभागीय अधिकारी अपने बचाव में काम अधूरा बताकर बजट का रोना रोते रहे। प्रथम चरण में कई इलाकों में पाइप लाइन बिछाकर पंपिंग स्टेशन तैयार किए जाने के बाद भी योजना चालू नहीं हुई। जब ट्रीटमेंट प्लांट तैयार हुआ तो कई जगह पाइप लाइन ध्वस्त हो गई।
अभियंता योजना फ्लाप होने और अपनी नाकामी छिपाने के लिए बजट आड़े लाते रहे। यहां तक कि अधिकांश चेंबर से नालियां जोड़ने के बाद भी योजना धराशाई हो गई। गौरतलब है कि योजना की शुरुआत से तीन बार हुई जांच में कई अभियंता इसके जद में आए। हालांकि फाइल ठंडे बस्ते में डालने से कोई कार्रवाई नहीं हुई। कई अभियंता सेवानिवृत्त भी हो गए।