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बांदा। शिव योग, सिद्धियोग और घनिष्ठा नक्षत्र के एक साथ पड़े संयोग ने महाशिवरात्रि का महत्व और श्रद्धा बढ़ा दी। ज्योतिषाचार्यों के मुताबिक, यह दुर्लभ संयोग लगभग 101 वर्ष बाद आया है। पंडित हर्षित महाराज ने बताया कि इस दुर्लभ संयोग से इस वर्ष शिवरात्रि का खास महत्व है।
शहर के शिवालयों में श्रद्धालुओं का हुजूम उमड़ पड़ा। मुख्य पूजा-अर्चना और भक्ति का प्रदर्शन बांबेश्वर पर्वत पर स्थित शिव मंदिर में हुआ। यहां पहाड़ की चट्टान के बीच गुफा में स्थित प्राचीन शिवलिंग में तड़के से देर शाम तक जल और दूध की धाराएं बहती रहीं। गंगाजल, दूध, घी, शहद और शक्कर के मिश्रण से शिवलिंग को स्नान कराया जाता रहा। फाल्गुन माह के कृष्ण पक्ष में चतुर्थी को शिवरात्रि मनाया जाता है। इसी दिन शिव और पार्वती का विवाह हुआ था।
भारी संख्या में भोले के भक्तों ने भोले का उपवास रखा। महेश्वरी देवी, काली देवी, निम्नी किनारे स्थित आदि मंदिरों में पूजा-अर्चना की धूम रही। बम-बम भोले के जयघोष गूंजते रहे। कटरा स्थित ब्रह्मकुमारी आश्रम से शिव की शोभायात्रा निकाली। ब्रह्मकुमारी गीता व शालिनी आदि शामिल रहीं। उधर, विश्वविख्यात कालिंजर दुर्ग में स्थित नीलकंठेश्वर मंदिर में भी भक्तों की भारी भीड़ रही। आसपास के गांव सहित सीमावर्ती मध्य प्रदेश के श्रद्धालु भी शामिल रहे।