बांदा। पर्यटन को बढ़ावा देने के लिए प्रदेश सरकार 100 साल या इससे अधिक पुराने और पौराणिक महत्व वाले वृक्षों को ‘विरासत वृक्ष’ घोषित कर रही है। वन विभाग ने चित्रकूटधाम मंडल में 58 वृक्षों का चयन किया है। इन्हें विरासत (हेरीटेज) वृक्ष के रूप में चयनित कर प्रस्ताव शासन को भेजा है। खास बात यह है कि वन विभाग ने निजी भूमि में लगे पुराने वृक्षों को भी सूची में शामिल किया है। इनकी संख्या लगभग 16 है।
विरासत श्रेणी में अधिकांश नीम, बरगद, पीपल, आम और शीशम के वृक्ष हैं। प्रदेश सरकार के निर्देश के बाद वन विभाग ने सैकड़ों वर्ष पुराने वृक्ष चयनित कर उनकी सूची तैयार कर ली। इसे शासन को भी भेज दिया गया। वन विभाग ने निजी भूमि में लगे 16 वृक्षों का चयन विरासत वृक्ष के रूप में किया है। मंडल के चारों जिलों बांदा, चित्रकूट, हमीरपुर और महोबा में निजी भूमि के चयनित वृक्षों में सबसे ज्यादा संख्या बांदा में है। यहां 15 वृक्ष चयनित किए गए हैं। वन विभाग का दावा है कि निजी भूमि में चयनित वृक्ष 100 साल से अधिक आयु के हैं। इनमें आम, शीशम, नीम, बरगद व पीपल हैं। इसी तरह चित्रकूट में मात्र एक देवरिहा मड़हा गांव स्थित निजी भूमि में लगे बरगद वृक्ष का चयन किया गया है।
इसके अलावा सार्वजनिक और पौराणिक स्थलों में लगे कुल 58 वृक्षों में सबसे ज्यादा 35 वृक्ष बांदा में चिह्नित किए गए हैं। महोबा में 15, चित्रकूट में सात और हमीरपुर में मात्र एक वृक्ष सूची में शामिल है। इनमें अधिकांश पीपल, बरगद और कल्पवृक्ष हैं। महोबा जिले में एक कल्पवृक्ष 2000 साल पुराना बताया गया है। इन चयनित वृक्षों की गोलाई तीन से 10 मीटर तक है। सैकड़ों साल पुराने वृक्षों को विरासत वृक्ष घोषित किए जाने के मद्देनजर वन विभाग ने इन्हें पर्यटन स्थल के रूप में विकसित करने की कवायद शुरू कर दी। विभाग को प्रदेश सरकार की हरी झंडी का इंतजार है। (संवाद)
बांदा जनपद : जिले के पैलानी क्षेत्र में पांच वृक्ष चयनित किए गए। इनमें सबसे ज्यादा 400 वर्ष पुराना बरगद का पेड़ आमारा गांव स्थित सामुदायिक भूमि में है। इसकी गोलाई करीब 9.40 मीटर है। इसके अलावा बबेरू क्षेत्र में 10, तिंदवारी क्षेत्र के कई गांवों में 19 और बांदा के दिवली गांव में एक वृक्ष (कुल 35) का चयन किया गया है। इन पेड़ों की उम्र 100 से 215 वर्ष के बीच बताई गई है। विरासत वृक्षों की सूची में पीपल के 20, बरगद के 10, नीम के दो और आम, शीशम व इमली के एक-एक पेड़ शामिल हैं।
महोबा जनपद : वन विभाग को जिले में 15 पुराने वृक्ष मिले हैं। 2000 साल पुराना कल्पवृक्ष कबरई ब्लाक के दक्षणेश्वर धाम (सिचौरा) में पाया गया। वृक्ष की गोलाई करीब 10.10 मीटर है। इसके अलावा महोबा, पनवाड़ी और चरखारी तहसील क्षेत्र में चार-चार व जैतपुर में तीन वृक्ष चिह्नित किए गए हैं। इनमें बरगद के 10, पीपल और कल्पवृक्ष के दो-दो व इमली का एक वृक्ष है। हमीरपुर में मात्र एक कल्पवृक्ष कुरारा वन ब्लाक अंतर्गत शहरी क्षेत्र में चयनित हुआ। इसकी उम्र लगभग 300 वर्ष बताई गई है।
चित्रकूट जनपद : यहां कुल सात वृक्षों का चयन हुआ। इनमें खोही गांव में कामदगिरि परिक्रमा मार्ग स्थित वन भूमि में तीन तेंदू के वृक्ष शामिल हैं। इनकी उम्र करीब 141 से 156 वर्ष आंकी गई है। इसी तरह कलचिहा (बरगढ़) पौधशाला और निही चिरैया (मानिकपुर) वन भूमि में एक-एक कटवर तथा बरगढ़ रेंज में कटैया डांडी सामुदायिक भूमि व देवरिहा मड़हा निजी भूमि में एक-एक बरगद चिह्नित किए गए हैं। इन वृक्षों की आयु 200 से 300 वर्ष दर्शाई गई है। इन वृक्षों की गोलाई छह से आठ मीटर है।
चित्रकूटधाम मंडल के चारों जिलों में 100 वर्ष से अधिक आयु के वृक्षों का चयन कर प्रस्ताव शासन को भेज दिया गया है। वृक्षों के चयन की फाइनल सूची शासन से तय होगी। विरासत वृक्षों से पर्यटन को बढ़ावा मिलेगा। निजी भूमि में लगे वृक्ष भी काफी पुराने और बड़े आकार के हैं। इसलिए इन्हें प्रस्ताव में शामिल किया गया।
-नरेंद्र कुमार सिंह, कंजरवेटर, वन विभाग, चित्रकूटधाम मंडल।
क्यों हैं बरगद-पीपल खास
बरगद : मान्यता है कि बरगद के मूल में ब्रह्मा, मध्य में विष्णु और अग्रभाग में भगवान शिव वास करते हैं। हिंदू सनातन धर्म में यह पूजनीय है। वट सावित्री के दिन विशेष पूजा होती है। खास बात यह है कि लंबे समय तक अक्षय रहने पर इसे अक्षय वट भी कहते हैं। वैज्ञानिक शोधों के अनुसार, जिन पेड़ों में पत्तियां ज्यादा होती हैं ऑक्सीजन भी ज्यादा देती हैं। बरगद पेड़ 20 घंटों से भी ज्यादा समय तक आक्सीजन देता है। पर्यावरण शुद्ध करने में सहायक है। चिकित्सीय महत्व भी है।
पीपल : पद्मपुराण के अनुसार पीपल को भगवान विष्णु का रूप माना जाता है, इसलिए इसे हिंदू धर्म में दैवी वृक्ष माना गया है। इसकी पूजा देवी-देवताओं की तरह होती है। अनेक ऋषि मुनियों और महात्मा बुद्ध ने पीपल के नीचे बैठकर तप कर ज्ञान हासिल किया। वैज्ञानिक महत्व के मुताबिक, पीपल का वृक्ष दिन-रात ऑक्सीजन छोड़ता है। जो पर्यावरण के लिए काफी महत्वपूर्ण है। पेड़ से पत्त कभी खत्म नहीं होते। पत्ते झड़ते हैं तो नए आते रहते हैं। इस खूबी से इसे जीवन-मृत्यु चक्र का द्योतक भी बताया गया है। चिकित्सीय क्षेत्र में भी काफी महत्व है। इसके रस व अन्य प्रयोग से दमा, गैस, कब्ज, दंत, त्वचा रोग में लाभ मिलता है। रस से विष का प्रभाव कम होने का भी दावा किया जाता है।