Villages and cities lit up with lamps
- फोटो : BANDA
बांदा। कार्तिक मास की सघन काली अमावस्या की रात लाखों दीपकों से जगमगा उठी। रंगीन आतिशबाजी ने इसे और दिलचस्प बना दिया। पटाखों के धमाके रह-रहकर गूंजते रहे। यह अद्भुत और सुंदर नजारा गुरुवार को सूर्यास्त के बाद शाम करीब सवा 6 बजे से शुरू हुआ। देर रात तक जारी था। अवसर था दीपोत्सव यानी दीपावली का।
दीपावली की लगभग सभी घरों में तैयारियां हफ्तों से चल रही थीं। प्रकाश पर्व का आगाज धनतेरस से हुआ। समापन दीपावली के दो दिन बाद भइया दूज से होगा। धनतेरस पर खरीदी गई गणेश-लक्ष्मी व कुबेर आदि की प्रतिमाएं सजे-संवरे घरों में स्थापित की गईं।
मुहूर्त के आते ही पूजा शुरू हो गई। घरों के अलावा दुकानों, कारखानों और प्रतिष्ठानों को भी साफ-सुथरा और रंग-रोगन से संवारा गया था। यहां भी दीपावली की पूजा हुई। परंपरा और आस्था के मुताबिक घरों में दीप जलाने से पहले मंदिरों में दीपक जलाए गए।
दीपावली की पृष्ठभूमि अयोध्या के राजा श्रीराम अपना 14 वर्षीय वनवास बिताकर अयोध्या लौटे थे। अयोध्यावासियों ने अपने प्रिय राजा के आगमन पर पूरी अयोध्या को घी के दीपकों से जगमगा दिया था। आज भी दीपावली पर्व यही संदेश बिखेर रहा है। उधर, परंपरा के मुताबिक दीपावली पर उपहारों का आदान-प्रदान भी खूब हुआ। खासकर मिठाइयों के तोहफों की भरमार रही। मिठाई की दुकानों में जमकर बिक्री हुई।