बांदा। साल दर साल चुनाव हुए तो प्रचार के तरीके भी बदलते गए। उम्र का शतक पार कर चुके मतदाताओं का कहना है कि पहले चुनाव की घोषणा का मतलब ही होता था कि महीने-दो महीने का हो हल्ला, लेकिन दो-तीन दशकों से चुनाव का न कोई शोर शराबा, न नारेबाजी और न ही लाउडस्पीकरों से प्रचार। पहले पंचायत का चुनाव प्रत्याशी के सामने हाथ उठाकर ही हो जाता था।
बुजुर्ग मतदाताओं के मुताबिक लोकसभा और विधानसभा चुनाव में कोई प्रत्याशी बैलगाड़ी से तो कोई साइकिल पर ही भोंपू बांधकर प्रचार के लिए निकलते थे। प्रत्याशी नेता नहीं बल्कि मेहमान होते थे, फिर वह चाहे पक्ष का हो या विपक्ष का, सभी के लिए मतदाताओं के दरवाजे पर खाट बिछती थी और उसी पर भोजन की थाली परोसी जाती थी। न तो कभी जीत का जश्न होता था और न हार की रंजिश। तब लगता था कि चुनाव दल हित में नहीं बल्कि देश हित में हो रहे हैं।
धूल से सने कपड़े ही पहने रहते थे नेता
1952 के चुनाव में नेता धोती-कुर्ता पहनकर गांवों की गलियों में धूल फांका करते थे। कई-कई दिन तक धूल से सने कपड़े ही पहनकर मतदाताओं के दरवाजों पर न सिर्फ खड़े रहकर वोट मांगते थे, बल्कि वहीं भोजन और विश्राम भी करते थे। आज नेता ही नहीं कार्यकर्ता भी लकालक कुर्ता पायजामा पहनकर गांव आते हैं। किसी का पसीना भी बह जाए तो वह प्रचार छोड़कर गाड़ी में बैठ जाता है।
-तुलइया पाल(उम्र 111 वर्ष ), खप्टिहाकलां
नेता चुपचाप सुना करते थे जनता की खरी-खोटी
शहर हो या गांव सभी जगहों की दीवारें चुनाव प्रचार के दौरान लाल, हरी और नीली दिखाई देती थीं। प्रत्याशी खुद ही पर्चा बांटा करते थे। कई बार ग्रामीण नेताओं से भिड़ भी जाते थे और उन्हें खरी-खोटी सुनाते थे। उस दौर में जीत के बाद नेता जनता को भूला नहीं करते थे, सांसद बनने के बाद भी गांव आकर समस्याएं पूछते थे। आज के नेता तो सिर्फ टीवी पर ही दिखते हैं।
-रामप्रताप द्विवेदी (101 वर्ष) ,सेवानिवृत्त शिक्षक, अलीगंज
सुबह निकलते तो शाम को लौटते थे वोट डालकर
-आज घर के पास ही वोट पड़ रहे हैं तो भी लोग डालने नहीं जाते हैं। हमारे जमाने में तो घर से दो से तीन किलोमीटर दूर वोट डालने जाना पड़ता था। हम लोग झुंड में सुबह निकलते थे। शाम को आसपास के गांवों का हाल लेते हुए वोट डालकर घर लौटते थे। हाथों में दलों के झंडे, टोपी और बिल्ले हुआ करते थे। अब तो चुनाव प्रचार के नाम पर लोगों के हाथ में सिर्फ मोबाइल ही दिखता है।
-फूलचंद्र याज्ञिक( 100 वर्ष) , सेवानिवृत्त कर्मचारी, अलीगंज
- 122 शतायु मतदाता बनेंगे युवाओं के प्रेरणास्रोत
बांदा। लोकसभा चुनाव में युवाओं और महिलाओं के अलावा करीब दो हजार बुजुर्ग मतदाता हैं, जो युवा वोटरों के लिए प्रेरणास्रोत बनेंगे। इनमें 122 मतदाता ऐसे हैं, जो 100 की दहलीज पार कर चुके हैं। 60 से 100 वर्ष तक के बुजुर्ग मतदाताओं की संख्या दो हजार से ज्यादा है। इन मतदाताओं के वोट डालने का इंतजाम निर्वाचन विभाग ने उनके घरों पर ही किया है।
बांदा-चित्रकूट लोकसभा सीट में पांच विधानसभा क्षेत्र हैं। इनमें बांदा की बबेरू, नरैनी और सदर विधानसभा क्षेत्र हैं। तिंदवारी विधानसभा क्षेत्र हमीरपुर-महोबा-तिंदवारी लोकसभा क्षेत्र में शामिल हैं। चारों विधानसभा क्षेत्रों में 100 से 109 वर्ष आयु के 115 मतदाता हैं। इनमें 40 पुरुष और 75 महिलाएं शामिल हैं। तिंदवारी विधानसभा क्षेत्र में 15 पुरुष व 31 महिला मतदाता हैं।
बबेरू में तीन महिलाएं व नौ पुरुष, नरैनी में 19 परुष व 20 महिलाएं, सदर विधानसभा में तीन पुरुष व 15 महिलाएं हैं, जो 100 से 109 वर्ष आयु के हैं। इसी तरह 110 से 119 वर्ष के भी मतदाता हैं। इनमें तिंदवारी विधानसभा में एक-एक महिला पुरुष तथा बबेरू मे एक महिला मतदाता है, जो 118 वर्ष की हैं। सदर विधानसभा क्षेत्र में 10 पुरुष और चार ऐसे महिला मतदाता हैं, जो 120 प्लस हैं। इसके अलावा 90 से 99 वर्ष के बुजुर्ग मतदाताओं की संख्या 27 है। जबकि 80 से 90 वर्ष के बुजुर्ग मतदाता 205 हैं। इनमें 103 पुरुष व 102 महिला मतदाता शामिल हैं। 70 से 79 वर्ष तक के 654 मतदाता हैं। जबकि 60 से 69 वर्ष आयु के मतदाताओं की संख्या 1200 है। इनमें 834 महिला व 366 पुरुष मतदाता हैं।