जिला अस्पताल के ट्रामा सेंटर के बंद कक्ष और सूने वार्ड।
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पिछले हफ्ते मुख्यमंत्री ने हमीरपुर में बांदा के जिस ट्रॉमा सेंटर का लोकार्पण किया है, वहां ट्रॉमा सेंटर जैसा कुछ नहीं है। स्वास्थ्य विभाग ने इसे ट्रॉमा सेंटर दिखाने का फिलहाल ‘ड्रामा’ किया है। इसे जिला अस्पताल का इमरजेंसी कक्ष बना दिया गया है। ट्रॉमा सेंटर के मानकों का नामोनिशान नहीं है। न उपकरण हैं और न स्टाफ।
लगभग ढाई करोड़ की लागत से ट्रॉमा सेंटर का भवन बनाया गया है। पिछले हफ्ते सोमवार को हमीरपुर के कुछेछा में मुख्यमंत्री अखिलेश यादव से बांदा के ट्रॉमा सेंटर के लोकार्पण की रस्म अदा कराई गई है। लोकार्पण का चमकता-दमकता और फूलों से सजा शिलापट्ट मुख्यमंत्री को ट्रॉमा सेंटर की हकीकत नहीं बयां कर सका। चित्रकूटधाम मंडल के इकलौते ट्रॉमा सेंटर में जिला अस्पताल के इमरजेंसी विभाग को शिफ्ट कर दिया गया है। यहां जिला अस्पताल के ईएमओ बैठा दिए गए हैं।
इनमें डॉ. विनीत सचान, डॉ. बलवीर और डॉ. प्रदीप गुप्ता शामिल हैं। ट्रामा सेंटर के कक्षों को वार्ड के रूप में इस्तेमाल कर जिला अस्पताल के मरीज भर्ती किए जा रहे हैं। प्लास्टर रूम, एक्स-रे रूम, औषधि वितरण कक्ष में बेड पड़े हैं। डाक्टरों के लिए बनाए गए चेंबरों में भी जिला अस्पताल के मरीजों को भर्ती किया जा रहा है। उधर, इसे बारे में जिला अस्पताल के मेडिकल आफीसर डॉ. विनीत सचान का कहना है कि ट्रॉमा सेंटर में स्टाफ की नियुक्ति नहीं हुई है। जिला अस्पताल की इमरजेंसी को यहां से चलाया जा रहा है।
मामूली घायल को भी कर देते हैं रेफर
बांदा। ट्रॉमा सेंटर का उद्देश्य दुर्घटना में घायल लोगों और गंभीर मरीजों को तत्काल प्राणरक्षक चिकित्सा सेवा और सर्जरी आदि है, लेकिन यहां के ट्रॉमा सेंटर में रोज यह ‘ड्रामा’ देखा जाता है कि मामूली चोट या फ्रैक्चर में भी घायल या मरीज को कानपुर, लखनऊ, झांसी या इलाहाबाद आदि के लिए रेफर कर दिया जाता है। सरहद से जुड़े मध्य प्रदेश के पन्ना, सतना, छतरपुर आदि जिले के मरीज भी यहां आते हैं। तमाम मरीज रेफर कर दिए जाने से रास्ते में दम तोड़ देते हैं। ट्रॉमा सेंटर के आईसीयू और मेजर ओटी में ताला लटक रहा है।