बांदा। बुंदेलखंड में तालाब और भूदान चारागाह मुक्ति अभियान के प्रति जागरूकता पैदा करने के लिए निकाली गई सात दिवसीय जल यात्रा लखनऊ में राज्यपाल और मुख्यमंत्री कार्यालयों में ज्ञापन देकर समाप्त हो गई। यात्रा में कई स्वयंसेवी और पर्यावरण के चिंतक शामिल थे। यात्रा ने 168 घंटे में 70 गांवों का भ्रमण किया।
पहली जुलाई को बांदा से जल यात्रा शुरू हुई थी। महोबा, राठ, जालौन, कानपुर नगर, कानपुर देहात और उन्नाव होकर यह लखनऊ पहुंची। वहां राज्यपाल और मुख्यमंत्री को ज्ञापन दिया। इनके अलावा जल यात्रियों ने हरेक जनपद में भी वहां के अधिकारियों और जनप्रतिनिधियों को यह ज्ञापन दिए।
ज्ञापन में सुप्रीम कोर्ट के आदेशों का हवाला देकर कहा गया कि गांवों में तालाब, पोखर, चारागाह और कब्रिस्तान की जमीनों पर अवैध कब्जे/अतिक्रमण हटाने के लिए हरेक जिलाधिकारी की अध्यक्षता में सात सदस्यीय समिति गठित हुई थी। लेकिन यह समिति निष्क्रिय और अनुपयोगी साबित हुई। अवैध कब्जों की भरमार है।
यह भी कहा गया कि बुंदेलखंड में वर्ष 1987 से 2016 के बीच 19 बार सूखा पड़ा। यहां चंदेलकालीन राजाओं ने 1300 साल पहले 5000 से ज्यादा तालाब बनवाए थे। ज्यादातर नदारद हैं। इसी तरह संत विनोबा द्वारा चलाए गए भूदान आंदोलन में करीब 9 लाख एकड़ में सार्वजनिक चारागाह थे। अब इनमें अवैध कब्जे या पट्टे कर दिए गए। तालाब विकास प्राधिकरण गठन की मांग भी पूरी नहीं की गई।
जल यात्रा संयोजक आशीष सागर ने बताया कि यात्रा को गांवों में जबर्दस्त समर्थन मिला। लखनऊ प्रेस क्लब में मीडिया वार्ता भी हुई। रामबाबू तिवारी, नलिनी मिश्रा, स्नेहिल सिंह, गौरव पांडेय, डा.मेराज अहमद सिद्दीकी, प्रो.योगेंद्र यादव, आयुष्मान सिंह, धीरज सिंह, स्वामी आनंद स्वरूप (गंगा मिशन), वरिष्ठ पत्रकार पीयूष बवेले, उवर्शी शर्मा, तनवीर अहमद, जीशान अख्तर, शिवनारायण सिंह परिहार, शकील, प्रणव, विजय कुशवाहा, अरविंद शुक्ला, अरविंद त्रिपाठी, शैलेंद्र श्रीवास्तव, वीरेंद्र गोयल, सूर्य प्रकाश तिवारी आदि शामिल रहे।