बांदा। केंद्र सरकार द्वारा बुंदेलखंड में कराया जा
रहा सूखे का सर्वे तमाम अनुभवी किसानों को लालीपॉप और रस्म अदायगी नजर आ
रहा है। इनका कहना है कि हाल ही में बुंदेलखंड के अध्ययन और सर्वे में आए
केंद्रीय कृषि मंत्रालय के अधिकारी ने आनन-फानन सर्वे की रस्म अदायगी कर
ली।
एक दिन के चंद घंटों में दो-दो जनपद का सर्वे महज खानापूरी
रहा। बैठक में अफसरों से तो राय-मशविरा कर लिया, पर किसानों को इसमें शामिल
ही नहीं किया।
इस वर्ष समूचा बुंदेलखंड सूखे की चपेट में है।
किसानों से लेकर जन प्रतिनिधि तक केंद्र और राज्य सरकारों का ध्यान आकृष्ट
करा रहे हैं। केंद्र सरकार ने तीन दिन पूर्व पांच व छह नवंबर को बुंदेलखंड
के सर्वे के लिए केंद्रीय कृषि मंत्रालय मेें निदेशक (हार्टीकल्चर) अतुल
पाटनी को यहां भेजा था।
केंद्रीय निदेशक ने पांच नवंबर को जालौन और
हमीरपुर का कुछ घंटों मेें ही सर्वे निपटा लिया। अगले दिन छह नवंबर को
बांदा में सुबह आठ बजे ही चित्रकूट और बांदा के अफसरों के साथ सर्किट हाउस
में बैठक की और वापस रवाना हो गए।
यह सब इतना आनन-फानन हुआ कि चाह
कर भी किसान और उनके संगठनों के नेता केंद्रीय निदेशक से मिल नहीं सके।
प्रशासन ने भी किसानों को केंद्रीय निदेशक की बैठक में शामिल करने के लिए
कोई पहल या रुचि नहीं ली।
बुंदेलखंड के प्रगतिशील किसान प्रेम सिंह
(बड़ोखर खुर्द) का कहना है कि इसके पहले भी बुंदेलखंड में केंद्रीय टीमों
ने सर्वे किया है, पर किसानों को कोई लाभ नहीं मिला।
बुंदेलखंड
पैकेज लालीपॉप साबित हुआ। किसी किसान का भला नहीं हुआ। अबकी भी कमोवेश
केंद्र और राज्य सरकारें किसानों के प्रति घड़ियाली आंसू बहाने के अलावा
कुछ करती नजर नहीं आ रही।
बुंदेलखंड में किसानों की लगातार वकालत
कर रहे प्रवास सोसायटी के आशीष सागर दीक्षित का कहना है कि केंद्रीय दल हवा
हवाई सर्वे करते हैं।
अपने चमचमाते वाहन नेशनल हाइवे और अन्य
सड़कों के किनारे स्थित खेतों में चंद मिनटों के लिए रोककर फसलों की
निरीक्षण की औपचारिकता पूरी कर लेते हैं। हाल ही मेें आए केंद्रीय निदेशक
ने भी यही किया। किसान उनसे मिलकर जमीनी हकीकत बता ही नहीं पाए।
किसानों
के पैरोकार और खेतों में तालाब बनाने की मुहिम चला रहे समाजसेवी किसान
पुष्पेंद्र भाई का कहना है कि ओला और बेमौसम की बारिश जैसी दैवी आपदाओं को
इस वर्ष नौ माह बीत गए केंद्र और राज्य सरकारें एक-दूसरे पर ठीकरा फोड़कर
पल्ला झाड़ रही हैं। बुंदेलखंड की परवाह दोनों सरकारों को नहीं है।