बदौसा में परिवार के साथ इफ्तार के समय दुआ करते बुजुर्ग रोजदार।
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बांदा। गुरुवार को 20वें रोजे के इफ्तार के साथ ही रमजान माह का दूसरा अशरह रुखसत हो गया। इसके साथ ही तीसरे और आखिरी अशरे की आमद हो गई। दूसरा अशरह मगफिरत का था। आखिरी अशरह जहन्नुम से निजात दिलाने का है। तीसरे अशरे में इस माह की सबसे अहम पांच रातें (शबे कद्र) भी हैं।
25 अप्रैल से शुरू हुआ रमजान अब आखिरी पड़ाव में है। तीसरे अशरे की शुरुआत के साथ रमजान की विदाई का माहौल बनने लगता है। लॉकडाउन के चलते इस बार रमजान की रौनकें मस्जिद और बस्तियों में नदारद हैं। अलबत्ता घर ही इबादत से गुलजार रहे।
शुक्रवार को तीसरे और आखिरी अशरे का पहला रोजा है। मस्जिदों में एतिकाफ भी शुरू होगा। एतिकाफ पर बैठने वाले मोतकिफ ईद का चांद देखकर घर लौटेंगे। आखिरी अशरे में 21, 23, 25, 27 और 29 रात को शबे कद्र मानी जाती है। ये पूरी रातें इबादत में गुजरती हैं। उलमा कहते हैं कि तीसरा अशरह जहन्नुम से निजात दिलाता है। बशर्ते इसकी पूरी कद्र की जाए।
ईदगाह और जामा मस्जिद के मुतवल्ली डा. शेख सादी जमां, हाजी महफूजुर्रहमान, हाजी हिफजुर्रहमान, हाजी अल्ताफ अहमद आदि का कहना है कि बीते दो अशरों में इबादतों में जो कमियां और कोताही हुई है उनकी भरपाई करने के लिए आखिरी अशरह भरपूर मौका है। दिन-रात इबादत में गुजार कर अपने और घर व खानदान तथा मुल्क के लिए दुआएं करनी चाहिए।