नरैनी। जघन्य घटना के आरोपी दंपती को फांसी की सजा मिलने के बाद बच्चों की सुरक्षा पर नई बहस छिड़ गई है। अभिभावकों और शिक्षकों का मानना है कि इंटरनेट और सोशल मीडिया बच्चों के लिए बड़ा खतरा बन गए हैं। अपराधी अब ऑनलाइन माध्यमों से बच्चों तक आसानी से पहुंच रहे हैं, जिससे उन्हें बहलाना-फुसलाना सरल हो गया है।
विशेषज्ञों के अनुसार मोबाइल फोन और सस्ते इंटरनेट की पहुंच ने बच्चों को डिजिटल दुनिया से जोड़ा है। हालांकि पर्याप्त जागरूकता के अभाव में वे साइबर अपराधियों का आसान निशाना बन जाते हैं। अजनबी लोग फर्जी प्रोफाइल बनाकर दोस्ती करते हैं और गेमिंग प्लेटफॉर्म के जरिए संपर्क बढ़ाते हैं। वे बच्चों से निजी जानकारी हासिल करने का प्रयास करते हैं। वहीं अभिभावकों का मानना है कि कई बार बच्चे डर या झिझक के कारण ऑनलाइन हुई घटनाओं की जानकारी साझा नहीं करते। इससे खतरा और बढ़ जाता है। इंटरनेट और सोशल मीडिया जहां ज्ञान के द्वार खोलते हैं, वहीं लापरवाही बरतने पर यह गंभीर खतरा भी बन सकते हैं।
समय रहते जागरूकता और सतर्कता ही बच्चों को सुरक्षित रख सकती है। परिवारों को बच्चों से खुलकर संवाद बनाए रखने की आवश्यकता है। उन्हें बच्चों के ऑनलाइन व्यवहार पर नजर रखनी चाहिए। बच्चों को डिजिटल सुरक्षा के नियम सिखाना भी महत्वपूर्ण है। शिक्षकों ने स्कूलों में साइबर सुरक्षा शिक्षा अनिवार्य करने की मांग की है। उनका कहना है कि बच्चों को अजनबियों से चैट न करने की सलाह दी जाए। उन्हें अपनी फोटो या निजी जानकारी साझा न करने को कहा जाए। किसी भी संदिग्ध संदेश की तुरंत सूचना अभिभावकों या शिक्षकों को देने के लिए प्रेरित किया जाए।
स्थानीय लोगों ने प्रशासन से साइबर जागरूकता अभियान चलाने की मांग की है। स्कूलों में कार्यशालाएं आयोजित करना भी आवश्यक बताया गया है। हेल्पलाइन नंबरों का व्यापक प्रचार-प्रसार करने की भी मांग की गई है। उनका कहना है कि डिजिटल युग में बच्चों की सुरक्षा के लिए सामूहिक प्रयास ही सबसे प्रभावी उपाय हो सकता है।