घुमंतू परिवारों की जिंदगी शायद फुटपाथों पर ही
गुजरती रहेगी। उन्हें स्थायी आशियाना या अन्य नागरिकों जैसे अधिकार और
सुविधाएं मयस्सर होती नजर नहीं आ रहीं।
बुंदेलखंड में पांच लाख से
ज्यादा घुमंतू परिवार आबाद हैं। दस साल पूर्व गठित राष्ट्रीय विमुक्त,
घुमंतू और अर्द्ध घुमंतू जनजाति आयोग भी इनको एक अदद आशियाना नहीं दिला
सका।
सड़क किनारे या गांव-बस्तियों के बाहर घुमंतू परिवारों के
अड्डे नजर आते हैं। बुंदेलखंड में भी इनकी खासी तादाद है। तमाम स्थानों पर
तो घुमंतू फुटपाथों पर ही दशकों से जमे हैं।
कुचबंधिया, पछइयां
लोहार, नट, बेड़िया, सांसी, भांतू, कंजर और कबूतरा जाति के लोग इनमें शामिल
हैं। बांदा, महोबा, हमीरपुर, झांसी आदि जनपदों में इनकी तादाद काफी है।
कुछ
परिवार फुटपाथों पर खुले मैदान में पड़ाव डालकर कई साल तक जमे रहते हैं।
बाद में आगे बढ़ जाते हैं लेकिन बड़ी संख्या में ऐसे परिवार भी हैं, जो
झुग्गी झोपड़ी बनाकर एक ही जगह बस गए हैं। लोहे के औजार, ढोलक, बांस का
सामान, गुलदस्ते आदि बनाना इनका पेशा है। बंदर और भालू का नाच दिखाकर भी
आजीविका का जुगाड़ करते हैं।
बड़ी तादाद होने के बाद भी घुमंतू लोग
समाज और सरकार दोनों से पूरी तरह उपेक्षित हैं। इन्हें सरकारी योजनाओं का
लाभ नहीं मिलता। मतदाता सूची में नाम दर्ज न होने से वोट देने का भी अधिकार
नहीं है, इसलिए नेता भी इनको तवज्जो नहीं देते।
हालांकि कई संगठन
इनके हक में आवाज उठाते रहे हैं। 14 मार्च 2005 को केंद्र सरकार ने घुमंतू
और अर्द्ध घुमंतू जनजातियों के सामाजिक और आर्थिक विकास के विभिन्न पहलुओं
का अध्ययन करने के लिए आयोग गठित किया था। दो सदस्यीय आयोग के अध्यक्ष
बालकृष्ण सिदाम रेणके थे।
आयोग ने अपनी सिफारिशें तभी केंद्र सरकार
को सौंप दी थी लेकिन यह ठंडे बस्ते में चली गईं। एक दशक बीत जाने के बाद
भी घुमंतू जहां के तहां हैं।