फुटपाथी व्यापारियों का कहना है कि प्रशासन के दबाव में उन्हें जबरन मेला परिसर में बैठाया गया है। जबकि वे पहले अपने पुराने स्थानों पर बेहतर कमाई कर रहे थे। फोटो न प्रकाशित करने के आग्रह पर एक दुकानदार ने बताया कि फुटपाथ पर ग्राहक सीधे आते थे और बिक्री होती थी, लेकिन मेले में लोग आते हैं, घूमते हैं और बिना कुछ खरीदे वापस लौट जाते हैं।
खर्चा बढ़ा है लेकिन कमाई नहीं हो रही व्यापारियों का यह भी कहना है कि यदि प्रशासन मेले का प्रचार-प्रसार समय रहते करता तो शायद कुछ बिक्री की उम्मीद की जा सकती थी। न तो सोशल मीडिया पर अभियान चला, न ही शहर में कहीं बैनर या होर्डिंग दिखाई दिए। ऐसे में आम जनता को मेला लगने की जानकारी तक नहीं मिल पाई।
इस पूरे आयोजन से स्पष्ट है कि स्वदेशी उत्पादों को बढ़ावा देने की मूल भावना को किनारे रखकर खानापूर्ति की गई। न तो स्थानीय उत्पादकों को प्रमुखता दी गई और न ही ग्राहकों तक उनकी पहुंच सुनिश्चित की गई। प्रशासन की इस लापरवाही ने न सिर्फ व्यापारियों को नुकसान पहुंचाया है, बल्कि सरकार की योजनाओं को भी कमजोर करने का काम किया है। यह आयोजन सरकार को भ्रमित करने और आंकड़ों की बाजीगरी करने तक सीमित दिखाई दे रहा है।
वर्जन
स्वदेशी मेले में जिले के कई उत्पाद के स्टाल लगे हैं। जिसमें से एक शजर और गोबर से निर्मित होने वाली वस्तुओं की स्टाल भी हैं। अतिक्रमण के कारण हटाए गए कुछ व्यापारियों को जरूर स्टाल दिए गए हैं, ताकि वह व्यापार कर सकें। क्योंकि वह भी तो स्वदेशी माल ही बेच रहे हैं।
- गुरुदेव, उपायुक्त उद्योग