बांदा। डेढ़ सौ लोगों की मौत और 10,700 से ज्यादा लोगों के कोरोना संक्रमण की चपेट में आने के बाद भी चित्रकूटधाम मंडल के एकमात्र राजकीय मेडिकल कॉलेज में डॉक्टर और स्वास्थ्य कर्मी बढ़ाने के लिए शासन से मिले बजट को लौटा दिया गया। अतिरिक्त स्वास्थ्य कर्मियों की नियुक्ति नहीं की गई। इसी तरह क्वारंटीन हुए डॉक्टर और स्वास्थ्य कर्मियों के प्रबंधन को आया बजट भी बिना खर्च किए सरेंडर कर दिया गया।
इस प्रकार दोनों मदों का कुल 23 लाख रुपये मेडिकल कॉलेज द्वारा जिला स्वास्थ्य समिति को सरेंडर कर दिया गया। पिछले वर्ष से कोरोना की गिरफ्त में आए चित्रकूटधाम मंडल के संक्रमित अधिकांश गंभीर मरीज बांदा राजकीय मेडिकल कॉलेज में ही लाए जा रहे थे। मेडिकल कॉलेज एल-2 हास्पिटल में बदल दिया गया था। चारों जनपदों बांदा, हमीरपुर, महोबा और चित्रकूट के हजारों मरीज यहां भर्ती किए गए। कई सैकड़ा की मौतें भी हुईं। उधर, शासन ने राजकीय मेडिकल कॉलेज को वर्ष 2020-21 में एनएचएम से एक्टिव क्वारंटाइन स्टेयरिंग की व्यवस्थाओं के लिए 18 लाख रुपये दिए थे। यह बजट क्वारंटाइन हुए डॉक्टर व स्वास्थ्य कर्मियों पर खर्च होना था।
राजकीय मेडिकल कॉलेज प्रशासन ने यह पूरा का पूरा बजट वापस कर दिया। हालांकि, क्वारंटीन डॉक्टर और स्वास्थ्य कर्मियों को कई असुविधाएं भी रहीं। अधिकांश अपने घरों में ही रहे। इसी तरह कोरोना के मद्देनजर शासन ने पिछले वर्ष नेशनल हेल्थ मिशन (एनएचएम) मद से राजकीय मेडिकल कॉलेज में अतिरिक्त मानव संसाधन (स्टाफ) बढ़ाने के लिए पांच लाख रुपये दिए थे। यह भी खर्च नहीं किए गए और पूरे के पूरे वापस जिला स्वास्थ्य समिति को सरेंडर कर दिए गए। यह जानकारी जन सूचना अधिकार अधिनियम के तहत समाजसेवी कुलदीप शुक्ल द्वारा मांगी गई सूचना में राजकीय मेडिकल कॉलेज के जन सूचना अधिकारी डॉ. वीरेंद्र सिंह यादव ने दी है। (संवाद)
भोजन का पैसा पूरा खर्च
शासन ने नेशनल हेल्थ मिशन (एनएचएम) मद से पिछले वर्ष राजकीय मेडिकल कॉलेज को भोजन प्रबंधन के लिए 33 लाख 5 हजार रुपये दिए थे। मेडिकल कॉलेज प्रबंधन ने यह पूरा का पूरा बजट खर्च कर दिया।
दूसरे साल आई स्टाफ बढ़ाने की सुध
चालू वित्तीय वर्ष 2021-22 में राजकीय मेडिकल कॉलेज प्रबंधन को नेशनल हेल्थ मिशन (एनएचएम) से मिले बजट से अतिरिक्त मानव संसाधन जुटाने की सुाध आई। पिछले साल जहां इस मद का पूरा बजट लौटा दिया गया था, वहीं इस वर्ष मिले 16 लाख 58 हजार 566 रुपये बजट में अब तक पांच लाख 21 हजार 224 रुपये खर्च किए जा चुके हैं। 11 लाख 37 हजार 342 खर्च होना शेष है। यह जानकारी भी कुलदीप शुक्ल द्वारा मांगी गई आरटीआई सूचना में दी गई है।
माननीयों ने निधि से नहीं दिया धेला
लगभग पिछले 15 माह से चल रहे कोरोना कहर के बीच जनपद के सांसद और विधायकों ने जहां स्कूलों और अन्य मदों में निधि के करोड़ों रुपये बांट दिए, वहीं राजकीय मेडिकल कॉलेज में कोराना की व्यवस्थाओं के लिए एक धेला भी नहीं दिया। पिछले वित्तीय वर्ष 2020-21 और चालू वर्ष 2021-22 में किसी सांसद या विधायक ने निधि से कोई पैसा नहीं दिया है। यह सूचना आरटीआई में दी गई है।
दवाओं से ज्यादा वेतन का बजट
चित्रकूटधाम मंडल के चारों जिलों बांदा, हमीरपुर, महोबा और चित्रकूट की 50 लाख से ज्यादा आबादी के बीच खुले एकलौते राजकीय मेडिकल कॉलेज में सरकारी बजट का अजब हाल है। यहां मरीजों की दवाओं से कहीं ज्यादा डॉक्टरों और स्टाफ के वेतन पर खर्च हो रहा है। आरटीआई में मिली जानकारी के मुताबिक, इस वर्ष वेतन मद में नौ करोड़ 86 लाख रुपये स्वीकृत हुए हैं, जबकि दवाओं और रसायन के लिए चार करोड़ 84 लाख का बजट स्वीकृत है। दवाओं के बजट में अब तक एक करोड़ 16 लाख 35 हजार 193 रुपये खर्च बताए गए हैं, जबकि वेतन में अब तक एक करोड़ 87 लाख 29 हजार खर्च बताया गया है।
मेडिकल कॉलेज के बजट में कुछ विशेष मदों पर बजट और खर्च---
मद बजट
प्रैक्टिस बंदी भत्ता 55,00,000
महंगाई भत्ता 2,95,80,000
यात्रा भत्ता 3,30,000
ट्रांसफर टीए 2,20,000
अन्य भत्ते 11,00,000
पेट्रोल आदि 6,00,000
छात्रवृत्तियां/छात्र वेतन 7,75,00,000
भोजन व्यय 25,00,000
चिकित्सा व्यय 7,00,000
मकान किराया भत्ता 15,00,000
कुल बजट 38,63,81,000
-बोले प्रधानाचार्य
एक्टिव क्वारंटीन स्टेयरिंग प्रबंधन के लिए मिला बजट डॉक्टर व नर्सिंग स्टाफ के हास्टल में क्वारंटीन रहने से अन्य बाहरी व्यवस्थाओं पर खर्च नहीं हुआ। अलबत्ता भोजन पर बजट खर्च हुआ है। उधर, अतिरिक्त मानव संसाधन का बजट वापस किए जाने पर कहा कि वार्ड ब्वाय और स्वीपर आदि अतिरिक्त स्टाफ रखा जाना था। 10 बेड पर एक डॉक्टर और दो नर्स के मानक के मुताबिक नियुक्तियां होनी थी, लेकिन दूसरी लहर में यह नियुक्तियां नहीं हो सकी।
- डा. मुकेश कुमार यादव प्रधानाचार्य, राजकीय मेडिकल कॉलेज बांदा
भवन बेहतर, व्यवस्थाएं बदतर
राजकीय मेडिकल कॉलेज का भवन जितना बेहतर है, व्यवस्थाएं उतनी ही बदतर हैं। यहां का प्रबंधन गंभीरता से जिम्मेदारियां निभाए तो मंडल के लिए मेडिकल कॉलेज विशेषकर गरीबों की जान बचाने का जरिया बन सकता है।
- कुलदीप शुक्ल, आरटीआई एक्टिविस्ट बांदा