नरैनी क्षेत्र के चौसड़ गांव में किसान रामनरायण के परिवार के हालात देख और सुनकर स्पेन के रिसर्च वर्कर मिगेल और सिगोर के मुंह से अनायास निकल पड़ा कि ‘हम बहुत दुखी हैं। यह हमारे लिए बहुत हृदय विदारक है’। बोले- ‘गवरमेंट हैज नो सॉलिड प्लान फार फार्मर’। यानि यहां की सरकार के पास किसानों के लिए कोई ठोस प्लान नहीं है।
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गर्मी, धूल और धूप के बीच दो विदेशियों को अपने बीच पाकर दैवी आपदा से जूझ रहे किसान कुछ देर के लिए अपना दर्द भूल गए। विदेशी मेहमान गांव के बच्चों के लिए भी आकर्षण का केंद्र बन गए। चौसड़ गांव में 7 बीघा के काश्तकार रामनारायण की फसल बर्बाद हो गई है।
बैंक और साहूकारों का उस पर 2.70 लाख रुपये कर्ज है। जमीन और पत्नी के गहनें गिरवी रखे हैं। कुछ दिनों पहले रामनारायण ने इन हालात से परेशान होकर बिजली के खंभे में चढ़कर आत्महत्या की कोशिश की थी। गांव वालों ने समझा-बुझाकर उसे रोका था।
शोधकर्ता सिगोर ने रामनारायण से सवाल किया कि कोई अधिकारी उसके पास आया? जवाब में रामनारायण ने कहा नहीं। कई बार तो अफसरों ने उसे डांटकर भगा दिया। मिगेल और सिगोर ने रामनारायण और उसके बच्चों से की गई बात डायरी में नोट की।
वे ओरन गांव में पिछले माह पेड़ पर चढ़कर फांसी के फंदे पर झूल गए किसान मन्नूलाल की पत्नी शकुंतला से मिले। मन्नूलाल पर एक लाख का कर्ज था। अब घर में फाकाकशी के हालात हैं। पत्नी ने बताया कि पति की मौत के बाद एसडीएम ने कोटेदार से 50 किलो गेहूं दिलवाया था।
उसके बाद किसी ने सुध नहीं ली। विदेशियों ने यह सारी बातें गौर से सुनी। किसानों के परिवारों से हमदर्दी भी जताई। मिगेल और सिगोर ने बदौसा और अतर्रा ग्रामीण क्षेत्रों में भी भ्रमण कर किसानों से मुलाकात की। उनके साथ विद्याधाम समिति के राजा भइया भी थे।
मिगेल और सिगोर ने बताया कि उन्होंने यहां जो भी देखा है वह काफी अफसोसजनक है। अपनी रिपोर्ट वह भारत सरकार को भी भेजेंगे। दोनों स्पेन में ‘इलपाइस’ नामक संगठन से जुड़े बताए गए हैं। यह संगठन देश-विदेश में किसानों और अन्य बदहाल लोगों पर अध्ययन करता है। दो दिन तक यहां भ्रमण करने के बाद स्पेन के यह दोनों मेहमान रविवार को शाम दिल्ली के लिए रवाना हो गए।
‘हम जानना चाहते थे कि क्यों हो रहा सुसाइड’
शोधकर्ता मिगेल और सिगोर के मुताबिक उन्होंने यहां किसानों की आत्महत्याओं की घटनाएं सुनी थीं, इसीलिए वह आए। किसान ऐसा क्यों कर रहे हैं? इसका क्या समाधान हो सकता है? इसी विषय पर उनका सर्वे है। बोले कि किसानों से जो उन्होंने सुना उससे वह काफी दुखी हैं।
जब लोग (किसान) उन्हेें यह बताते हैं कि वह अपने को क्यों खत्म कर रहे हैं तो काफी अजीब लगता है। अभी ऐसे लोग भी उन्होंने देखे हैं जो आत्महत्या जैसे हालात की कगार पर हैं।
किसी भी सरकार को उनकी चिंता नहीं है। सरकारों को चाहिए कि आत्महत्याएं रोकने के लिए ठोस प्लान बनाएं। जिन किसानों ने सुसाइड कर लिया है उनके बच्चों की शिक्षा, स्वास्थ्य और भरण-पोषण पर विशेष ध्यान दिया जाए।