रमजान माह का दूसरा अशरा भी खत्म हो गया। तीसरे की अशरे की शुरुआत के साथ ही इस माह की एक खास इबादत मस्जिदों में एतिकाफ भी शुरू हो गया। माह के अब आखिरी अशरे (10 दिन) खास हैं। इसी में पांच रातें शबे कद्र की हैं। सामूहिक इफ्तार का सिलसिला और ईद की खरीदारी भी तेजी से चल रही है।
रविवार को शाम सूरत ढलते ही 20वें रोजे के इफ्तार के साथ दूसरा अशरा रुखसत हो गया। यह मगफिरत का अशरा कहा जाता है। तीसरा और आखिरी अशरा जहन्नुम से निजात का है। मस्जिदों एत्तेकाफ शुरू हो गया। लगभग सभी मस्जिदों में एक, दो या इससे ज्यादा लोग एतिकाफ पर बैठ गए हैं। यह दिन रात इबादत करेंगे। ईद का चांद देखकर एतिकाफ खत्म होगा। तभी यह मस्जिद से घर लौटेंगे।
मदरसा जामिया अरबिया, हथौरा में हमेशा की तरह अबकी भी बड़ी संख्या में बांदा सहित विभिन्न जनपदों से आए लोग मदरसा नाजिम हाफिज कारी हबीब अहमद के साथ एतिकाफ पर बैठ गए। आखिरी अशरे में ही 21, 23, 25, 27 और 29वीं रात को शबे कद्र होती है। रविवार की रात पहली शबे कद्र थी। इन रातों को रोजदार व अन्य लोग पूरी रात इबादत में गुजारते हैं। उलेमा बताते हैं कि इस रात इबादत करने का बदला हजार रात की इबादत से भी ज्यादा है।
उधर, दूसरे अशरे के आखिरी दिन नवाबी जामा मस्जिद में ट्रांसपोर्टर इरशाद अहमद ने इफ्तार पार्टी की। बड़ी तादाद में रोजदार शरीक हुए। इफ्तार और खाने के बाद सामूहिक नमाज अदा की गई। इफ्तार में मदरसा हथौरा के मुफ्ती नजीब अहमद कासमी, डॉ.मोहम्मद रफीक, मुतवल्ली शेख सादी जमां, मुमताज अली, जिला पंचायत पूर्व अध्यक्ष हाजी शकील अली, कमरुद्दीन खां उर्फ मुन्ना, वार्ड मेंबर लल्लू खां, पूर्व डीडीसी मोहम्मद इदरीश, एमआर शकील खां, अय्यूब अली, मुशीर अहमद, बाबा फरीद, हाजी शब्बीर अली बबलू, हाजी मोहम्मद शाकिर इत्यादि शामिल रहे।