95 हजार लीटर लहन और 18 भूमिगत टैंक कराए नष्ट
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बांदा। अवैध खनन पर हाईकोर्ट के सीबीआई जांच का आदेश होते ही बालू माफिया ने बचाव का रास्ता खोज लिया। उसने बालू की काली कमाई बरकरार रखने के लिए अब बुंदेलखंड की सरहद से जुड़े मध्य प्रदेश की खदानों पर नजरें गड़ाई हैं। वहां कई खदानें पहले से चल रही हैं। अब नई खदानें खोजी जा रही हैं। इतना ही नहीं एमपी की खदानों के रवन्नों की आड़ में सीमा पर स्थित यूपी की खदानों से भी चोरी-छिपे खनन का रास्ता बनाया जा रहा है। बांदा, चित्रकूट और महोबा सहित लगभग पूरे बुंदेलखंड की सरहद मध्य प्रदेश के पन्ना, सतना, छतरपुर आदि जिलों से जुड़ी हैं। वहां भी बालू और पत्थर की खदानें हैं। परेई, कुरधना, चांदीपाटी आदि एमपी की खदानों में पहले से ही खनन चल रहा है। एमपी के बालू कारोबारी और माफिया वहां के रवन्ने पर यूपी (बांदा) की सीमा में आने वाली खदानों से भी खनन करते हैं। इसके लिए उन्हें यहां के प्रशासन, पुलिस और खनिज विभाग का साधना पड़ता है।
हाईकोर्ट के सख्त आदेश के बाद बुंदेलखंड के कई बालू कारोबारियों ने मामला ठंडा होने तक यूपी की खदानों को बंद करके एमपी में खनन का मंसूबा बांधा है। इसके लिए उन्होंने एमपी के खनन माफिया से हाथ मिलाया है। सूत्रों के मुताबिक एमपी की कुरधना, परेई और चांदीपाटी आदि खदानों से लोड होने वाले ट्रक बांदा जिले से होकर यूपी के तमाम शहरों तक जाएंगे। हाईकोर्ट के आदेश के बाद भी अभी इन खदानों से बारिश से पहले डंप की गई बालू ट्रकों में लोड कर बाहर भेजने का सिलसिला जारी है। बांदा के अधिकारी और पुलिस अभी भी पहले की तरह चुप्पी साधे हैं।
परमिट गिने-चुने, डंप बालू जगह-जगह
बांदा। बारिश में नदियों का जलस्तर बढ़ने के बाद तलहटी और खदानें डूब जाती हैं, इसलिए बारिश से पहले ही बालू को ऊंचे स्थानों पर डंप किया जाता है। बारिश में यह बालू कई गुना महंगी बिकती है। बुंदेलखंड में बालू डंप करने के लिए गिने-चुने लाइसेंस ही जारी हुए हैं लेकिन बालू के भंडार जगह-जगह हैं। पिछले करीब एक पखवारे से यही बालू ट्रकों में लोड की जा रही है। डंप का परमिट बनवाने के लिए कोई शुल्क नहीं है लेकिन अब यह मोटी रकम देने पर ही मिलता है। यही वजह है कि पिछले वर्षों में इक्का-दुक्का लोग ही परमिट ले पाए हैं। सीबीआई की जांच डंप बालू और परमिट जारी करने वाले अफसरों पर भी टिक सकती है।