30 साल पहले भोपाल में यूनियन कार्बाइड कंपनी से रिसी गैस के आंसू आज भी थम नहीं रहे। बुधवार को एक बार फिर ‘भोपाल गैस त्रासदी दिवस’ इसके पीड़ितों के जख्मों को हरा-भरा कर देगा। यहां की बशीरन को भोपाल की गैस ने विधवा कर दिया। उसका पति छीन लिया। उधर, अपनी बुआ और उसके तीन मासूम बच्चों के साथ गैस हादसे की भीड़ में रात भर भागा अजीज बेग भी उस भयावह रात को भुला नहीं पाया।
2-3 दिसंबर 1984 को भोपाल के छोला इलाके मेें स्थित यूनियन कार्बाइड कंपनी से अचानक गैर रिसाव हुआ था। इसमें हजारों लोग मारे गए। यहां मर्दननाका निवासी वृद्धा बशीरन बताती हैं कि उसका पति शेख जहूर भोपाल मेें अपनी पुत्री और दामाद के साथ रहकर फलों का ठेला लगाकर परिवार का भरण पोषण कर रहा था। गैस की चपेट में आकर गंभीर रूप से बीमार हो गया। आंखों की रोशनी भी कम हो गई। हजारों रुपये इलाज में खर्च करने के बाद भी उसे बचाया नहीं जा सका। भोपाल की गैस में जहूर की जान ले ली और बशीरन को बेवा कर दिया। अब यहां पुत्री के घर मेें छोटी सी परचून की दुकान रखकर जिंदगी गुजार रही है। तमाम कोशिशोें और भाग दौड़ के बाद भी पति की मौत का मुआवजा नहीं मिला।
इसी मोहल्ले की हाजरा पत्नी शमशेर ने कहा कि वह काली रात याद आते ही रूह कांप जाती है। उसकी शादी के कुछ दिनों बाद ही ससुराल भोपाल में गैस प्लांट में यह हादसा हो गया। तड़के करीब दो बजे कोहराम मच गया। जिस तरफ हवा का रुख होता गैस उधर फैला जाती। आंखों में जलन और बेहताशा खांसी के बाद सांसे थम जातीं। अस्पताल मेें तिल रखने की जगह नहीं बची। उसने भागकर बमुश्किल जान बचाई। हादसे के बाद शुरू में उसे 200 रुपये मासिक सहायता मध्य प्रदेश सरकार से मिलती रही। बाद में वह भी बंद हो गई। यहां बाइक मकैनिक अजीज बेग भी भोपाल गैस कांड के चश्मदीद गवाह हैं और भुक्तभोगी हैं। अजीज बताते हैं कि घटना वाली रात वह अपनी फूफी के घर पर था। रात को पूरा परिवार सो रहा था। तड़के करीब एक बजे सभी को सोते पड़े खांसी आने लगी। कुछ देर मेें बाहर भाग दौड़ का शोर सुनाई पड़ा। बाहर निकल देखा तो बड़ी तादाद में लोग भागते जा रहे थे। हरेक यही चीख रहा था कि- ‘भागो, मौत आ रही है।’ किसी को इतनी दम नहीं थी कि दूसरे को बताए की हुआ क्या? अजीज बताते हैं कि वह अपनी फूफी और उनके तीन मासूम बच्चों को साथ लेकर भाग चले। भीड़ में सैकड़ों लोग गिरते रहे। फिर वह उठ नहीं सके। उनकी लाशों को लोग रौंदकर भागते रहे। करीब आठ किलोमीटर भागते रहने के बाद तड़के वह भोपाल शहर के बाद भदभदा पहुंचे। वहां एक रिश्तेदार बशीर चचा के मकान में पनाह ली। दूसरे दिन सुबह फिर गैस रिसाव की अफवाह फैली और भगदड़ मची। भोपाल के हमीदिया अस्पताल में लाशों का अंबार लगा था। तमाम लोग सिसक रहे थे लेकिन उन्हेें बचाने वाला कोई नहीं था।