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जकात अदा न किया तो काम नहीं आएगा रोजा और नमाज

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नमाज के बाद दुआ मांगती नन्हीं रोजेदार उमरा खान। - फोटो : BANDA
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बांदा। रमजान माह का आखिरी अशरा शुरू होने के बाद अब जकात अदायगी पर जोर दिया जा रहा है। इस्लाम में जकात एक तरह का शरई टैक्स है। यह फर्ज है। नमाज के बाद इसी का मुकाम है। मुसलमानों को हर साल अपनी आमदनी/संपत्ति का ढाई फीसदी हिस्सा गरीबाें/ पात्रों को दान देना फर्ज है।
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इसी को जकात कहते हैं। आमतौर पर वैसे मुस्लिम वर्ग रमजान माह में जकात अदा करता है। इसकी अदायगी के लिए इस्लाम ने सख्त हिदायत दी है। हैसियत होने के बाद हीलाहवाली करने या जकात न देने पर सख्त सजा की चेतावनी दी गई है। जकात हरेक पर फर्ज नहीं है बल्कि शरीयत द्वारा तय की गई हैसियत वालों पर यह फर्ज है।
आल इंडिया काजी बोर्ड के नायब सदर मौलाना मुमताज रब्बानी ने कहा कि जकात फर्ज होने से इंकार करने वाला दीने इस्लाम से खारिज हो जाता है। जो हैसियत होने के बाद भी जकात नहीं देता उसका रोजा, नमाज, हज कुछ काम नहीं देगा। वह सख्त गुनहगार है। इस्लामी शरीयत ऐसे लोगों को सख्त से सख्त सजा देने को कहती है। जकात में देरी भी ठीक नहीं।
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जिसके पास साढे़ सात तोला सोना या 52 तोला चांदी या फिर इनकी कीमत के बराबर पैसा हो उसे जकात देना फर्ज है। गरीब और मजबूर, मिस्कीन (असहाय), यतीम (अनाथ), मुसाफिर और दीनी इदारों आदि को दी जा सकती है।

Rosa and namaz will not work if you do not pay zakat- फोटो : BANDA

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