फ्री ई-पेपर
पर्सनलाइज़्ड फ़ीड
पर्सनलाइज़्ड नोटिफ़िकेशन
चलते-फिरते ख़बरें
लॉयल्टी रिवॉर्ड्स
विज्ञापन

पेड़ों से चिपककर बचाएंगे बकस्वाहा का जंगल

विज्ञापन
विज्ञापन
बांदा। बुंदेलखंड के मध्यप्रदेश के छतरपुर जिले के बकस्वाहा जंगल को हीरा खदान में बदलकर यहां दो लाख से ज्यादा हरे पेड़-पौधे काटे जाने की तैयारियों के विरोध में बुंदेलखंड के पर्यावरण प्रेमियों ने मोर्चा खोल दिया है। सेव बकस्वाहा फारेस्ट कैंपेन (बकस्वाहा जंगल बचाओ अभियान) छेड़ दिया है। अभियान की शुरुआत सोशल मीडिया से हुई है। इसमें अब तक 1.12 लाख लोग जुड़ चुके हैं। लोगों को उम्मीद है कि बकस्वाहा जंगल बचाओ अभियान छेड़ने से कुछ हद तक हरे पेड़-पौधों को काटने से रोका जा सकता है।
विज्ञापन

कोरोना संक्रमण खत्म होने के बाद यह अभियानी बकस्वाहा जंगल की ओर कूच करेंगे। इस दौरान मोर्चा खोले बुंदेली पर्यावरण प्रेमियों ने खबरदार किया है कि चिपको आंदोलन की तर्ज पर पेड़ों से चिपककर इन्हें काटने का विरोध किया जाएगा। बांदा के सीमावर्ती मध्यप्रदेश के छतरपुर जिले के बकस्वाहा गांव में लगभग 62 हेक्टेयर क्षेत्रफल में घना जंगल है। यहां लाखों पेड़-पौधे हैं। इस जंगल की धरती पर हीरे की खदान बताई गई है। यहां लगभग 22 लाख कैरेट होने का अनुमान बताया जा रहा है। इनमें कुछ हीरे निकाले भी जा चुके हैं। हाल ही में मध्य प्रदेश शासन के खनिज विभाग ने इस जंगल/हीरा खदान की देश की एक बड़ी कंपनी को नीलामी पर 2500 करोड़ रुपये में 50 साल तक का खनन पट्टा दे दिया है। इस बाबत स्थानीय लोग बताते हैं कि आस्ट्रेलिया की एक कंपनी ने भी खदान लेने के लिए बोली लगाई थी।
हीरों के लिए हरियाली का खात्मा किए जाने की प्रदेश सरकार की के विरुद्ध उत्तर प्रदेश और मध्यप्रदेश में फैले बुंदेलखंड के पर्यावरण प्रेमियों ने मोर्चा खोल दिया है। इन्होंने सोशल मीडिया के जरिए सेव बकस्वाहा फारेस्ट कैंपेन शुरू कर दिया है। इसमें अब तक तकरीबन 1.12 लाख लोग जुड़ भी चुके हैं। इस बाबत बुंदेली पर्यावरण प्रेमियों ने कहा कि कोरोना संक्रमण काल खत्म होते ही वह बकस्वाहा जंगल की ओर कूच करेंगे। खबरदार भी किया जरूरत पड़ी तो चिपको आंदोलन की तर्ज पर पेड़ों से चिपककर इन्हें काटने का विरोध भी किया जाएगा। अभियान चलाने वालों का दावा है कि देश की लगभग 50 संस्थाओं ने उनके इस अभियान का समर्थन किया है। जंगल बचाने के लिए वेबिनार हुए हैं। अभियान से जुड़े बकस्वाहा क्षेत्र के युवाओं ने मोबाइल फोन और सोशल मीडिया के जरिए लोगों से संपर्क तेज कर दिया है।
विज्ञापन

सुप्रीम कोर्ट पहुंचा बकस्वाहा मुद्दा
बकस्वाहा जंगल काटने का मुद्दा सुप्रीम कोर्ट तक पहुंच गया है। दिल्ली की समाज सेविका नेहा सिंह ने पिछले माह नौ अप्रैल को यहां याचिका दायर की है। सुप्रीम कोर्ट इस पर सुनवाई के लिए राजी हो गया है। याचिका में मांग की गई कि यह अनुबंध निरस्त किया है। हीरों के लिए लाखों पेड़ काटा जाना स्वीकार नहीं है।
कोरोना ने बताई ऑक्सीजन की अहमियत
बकस्वाहा जंगल बचाने के अभियान से जुड़े वरिष्ठ पर्यावरण प्रेमी डा. धर्मेंद्र कुमार का कहना है कि कोरोना ने आक्सीजन की अहमियत बता दी है। इसके बाद भी इतनी बड़ी संख्या में पेड़ काटने की तैयारी हैरत की बात है। उन्होंने कहा कि महामारी खत्म होते ही यह अभियान तेज किया जाएगा।
हीरा ठेकेदारों की जंगल में गिद्ध नजर
बुंदेलखंड में पर्यावरण सुरक्षा के लिए सक्रिय स्वयंसेवी आशीष सागर दीक्षित का कहना है कि बकस्वाहा के हरे जंगलों में हीरा ठेकेदारों ने गिद्ध नजर गड़ा दी है। केन-बेतवा नदी गठजोड़ में लगभग 23 लाख पेड़ और पौधेे काटे जाएंगे। बुंदेलखंड एक्सप्रेस-वे निर्माण में 1.90 लाख पेड़ों का खात्मा किया जा चुका है। आशीष ने कहा कि विकास के नाम पर बुंदेलखंड को और भी ज्यादा चटियल मैदान बनाने की सरकारी कोशिशें तेजी से जारी हैं।
-आशीष सागर दीक्षित, पर्यावरण कार्यकर्ता, बांदा
मुगल, ब्रिटिश समय से है बकस्वाहा जंगल
यूपी-एमपी के बुंदेलखंड में अंधाधुंध हो रहे पहाड़ और नदियों के खनन से पर्यावरण को लगातार नुकसान पहुंच रहा है। बकस्वाहा का जंगल मुगलकाल और ब्रिटिश हुकूमत से चला आ रहा है। हीरा खदान के लिए इसका विनाश बहुत ही हानिकारक होगा।
-प्रेम अनुरागी, पर्यावरण कार्यकर्ता, महोबा
इंसेट---
यूपी के बुंदेलखंड में वन क्षेत्र (प्रतिशत)---
बांदा 1.21
महोबा 4.50
चित्रकूट 18.5
हमीरपुर 3.6
जालौन 5.6
झांसी 6.66
ललितपुर 7.8
इंसेट---
विधायक ने कहा, फिजूल का विरोध
बकस्वाहा में हीरा खदान परियोजना का भाजपा के क्षेत्रीय विधायक (बड़ा मलेहरा) प्रद्युन्न सिंह लोधी ने समर्थन किया है। उनका कहना है कि पट्टा/लीज पचास साल के लिए है। कहा कि एक दिन में लाखों पेड़ नहीं कट जाएंगे। पहले से यह कह देना भी ठीक नहीं कि कितने पेड़ कट जाएंगे। भूगर्भ और पर्यावरण के अधिकारी मौके पर जाकर देखेंगे। इसके के बाद काम शुरू होगा। इसका विरोध फिजूल है।
विज्ञापन
विज्ञापन
Next
AU ऐप में पढ़ें