चित्रकूटधाम मंडल में ‘कठिया’ गेहूं अब विलुप्त हो रहा है। कम सिंचाई और कम लागत में तैयार होने वाले इस गेहूं की फसल दो दशक पहले तक यहां लहलहाती थी। लेकिन ज्यादा उत्पादन की चाहत ने इसे हाशिए पर ला दिया है। कृषि वैज्ञानिक और प्रगतिशील किसान कठिया प्रजाति के गेहूं के कायल हैं और किसानों को इसका उत्पादन बढ़ाने की सलाह दे रहे हैं।
कृषि विभाग के आंकड़ों के मुताबिक चित्रकूटधाम मंडल में मौजूदा समय में सिर्फ चार हेक्टेयर में कठिया गेहूं का उत्पादन हो रहा है। जबकि चारों जिलों में 3,51,233 हेक्टेयर क्षेत्रफल में गेहूं की बुवाई होती है। इसमें सबसे ज्यादा बांदा में 1.52 लाख हेक्टेयर में गेहूं की फसल बोई जाती है।
हमीरपुर में 1820 हेक्टेयर, महोबा में 1625, चित्रकूट में 312 और बांदा में 243 हेक्टेयर में कठिया की खेती सिमट गई है। बांदा में जसपुरा, तिंदवारी व कमासिन क्षेत्र में कठिया की कुछ खेतों में बानगी देखने को मिलेगी। जबकि हमीरपुर में बिंवार, मौदहा और राठ क्षेत्र में किसान कठिया प्रजाति को जीवित किए हैं। कठिया छोड़ किसानों ने अब गेहूं की बाहरी प्रजातियां आरआर-21, 554, काशी 3312 आदि प्रजातियों को अपना लिया है। इनमें पैदावार प्रति हेक्टेयर 24 से 25 कुंतल होती है, पर लागत भी कई गुना लगती है।
तीन-तीन बार सिंचाई व पलेवा के साथ किसान मनमाना यूरिया और डीएपी डालते हैं। नतीजा में लागत इतनी ज्यादा हो जाती है कि उपज का ज्यादातर हिस्सा खर्च में ही समा जाता है। उधर, किसानों का कहना है कि कठिया तो बोना चाहते हैं, पर इसका बीज नहीं मिल रहा है। कई सालों पहले अन्य प्रजातियों के चक्कर में कठिया का बीज ही टूट गया। उधर, कृषि विज्ञान केंद्र के वैज्ञानिक डॉ.जितेंद्र सिंह का कहना है कि गेहूं की चाहे जितनी नई प्रजातियां आ गई हों, पर कठिया बेजोड़ है। पैदावार में भी और खाने में भी। किसान कठिया और अन्य प्रजाति बोकर देखें। लागत के हिसाब से कठिया खरा उतरेगा।