बांदा। बड़ोखर खुर्द गांव के ह्यूमन एग्रेरियन सेंटर हाल में चल रही लेखक
और विचारकों की राष्ट्रीय कार्यशाला में शनिवार को दूसरे दिन जाति उन्मूलन
और दलित महिलाओं के मुद्दे छाए रहे।
ज्यादातर रचनाकारों और
विचारकों ने अंतर्जातीय विवाह की वकालत की। कहा कि अंबेडकर के नाम पर
राजनीति तो होती है लेकिन न तो कहीं अंबेडकर की सोच है और न ही उनके आदर्श
अपनाए जाते हैं। जातिवादी सोच रखने वालों को मानसिक रोगी बताया गया।
आंकड़े
पेश हुए कि देश में आठ करोड़ दलित महिलाएं कृषि कार्य कर रही हैं। देश
मेें 98 फीसदी संपत्ति पुरुषों के नाम हैं। आज भी गरीब परिवार साथ में
बैठकर भोजन-भजन नहीं कर सकते। गोष्ठी का आयोजन जनवादी लेखक संघ ने किया है।
चार अक्तूबर को इसका समापन होगा।
‘जाति उन्मूलन में दलित साहित्य
की भूमिका’ पर दिल्ली से आए दलित साहित्य वार्षिकी के संपादक जय प्रकाश
कर्दम ने कहा कि जाति उन्मूलन जटिल विषय है। जाति का मतभेद खत्म करने के
लिए ईश्वरवाद से मुक्ति जरूरी है। वर्ण व्यवस्था और वर्चस्ववाद खत्म हुए
बगैर जाति भेद खत्म नहीं होगा।
उन्होंने कहा कि गांवों में शहरों से
दलितों की स्थिति भिन्न हैं। गांवों में जाति का भेद तो रहता है, पर
दलितों का दबदबा भी रहता है, लेकिन शहरों मेें जाति का असर होता है, पर
दबदबा नहीं होता। उन्होंने कहा कि सोच बदलनी होगी। सिर्फ साथ रहने, उठने,
बैठने से ही जाति भेद खत्म नहीं होगा।
खूनी रिश्ते बनना जरूरी है।
वे अंतर्जातीय विवाह के पक्षधर हैं। उनकी दो बेटियां हैं। दोनों से कह रखा
है कि वे अपनी पसंद से शादी कर सकती हैं। उन्होंने कहा कि दलितों का एक
वर्ग ऐसा भी उभर रहा है जो पूंजीवादी है। दलित साहित्य ने कभी दलित राजनीति
का समर्थन नहीं किया।
दलित स्त्री की समस्याओं को लेकर कई आंदोलन
चला चुकी दिल्ली की विचारक और मुक्ति संगठन की संयोजक अनिता भारती ने दलित
उत्थान के नाम पर एनजीओ चलाने वालों को आड़े हाथों लिया। कहा कि कुछ दिन इस
मुद्दे पर काम करने के बाद एनजीओ फंड मिलने वाले मुद्दे उठाने लगे।
उन्होंने
ने कहा कि जातिवादी सोच रखने वाला व्यक्ति मानसिक रोगी होता है। ऐसे लोगों
को चिह्नित किया जाना चाहिए। इस पर भी हैरत जताई कि महिला उत्पीड़न जैसे
मुद्दों पर होने वाले आंदोलनों में ही महिलाओं की भूमिका कम है। कहा कि
गरीब और दलित महिला आज भी पीड़ित है।
कोई मालकिन के डर से तो कोई
पति की पिटाई से। दलित महिलाओं के प्रति लोगों का नजरिया बदला होता है।
पुरुष प्रधान समाज में अभी भी महिलाएं दबी हैं। उन्होंने कहा कि पवित्र
शब्द को डंडे से पीटकर खत्म करना होगा।
साहित्यकार और विचारक पूर्व
प्रो. रेखा अवस्थी (दिल्ली) का कहना है कि सवर्ण महिलाओं की स्थिति भी
दलितों जैसी है। लड़कियों को शिक्षित बनाने में आज भी लोग कतराते हैं।
पत्नियों को मारने की प्रथा भी खत्म नहीं हुई।
देश मेें 98
फीसदी संपत्ति पुरुषों के नाम है। गरीब परिवार साथ बैठकर भोजन और भजन नहीं
कर सकता। प्रो. अवस्थी ने कहा कि सिंदूर भरने मात्र से पुरुष महिला पर पूरा
अधिकार हासिल कर लेता है। संतान उत्पत्ति, पति और परिवार की सेवा ही
स्त्री का धर्म बनकर रह जाता है।
उन्होंने हैरत जताई की अब कोख की
बिक्री हो रही है। स्त्री उत्पीड़न का यह नया तकनीकी हथकंडा है। यह सब
आर्थिक और पुरुष सत्ता करा रही है। इसे रोका जाना जरूरी है। श्रम से लेकर
जातिगत उत्पीड़न रोकने तक के लिए आंदोलन किया जाना चाहिए। उन्होंने कहा कि
मात्र दो फीसदी संपत्ति की मालकिन महिलाएं हैं, लेकिन उसमें भी पुरुषों का
दखल रहता है।