बांदा। जिले के बाढ़ प्रभावित गांव नांदादेव की सुरजा ने बताया कि कल एक-एक लंच पैकेट मिला था। पैकेट में चार पूड़ियां थीं। इससे न बच्चों का पेट भरा न ही हमारा। ऐसा ही हाल तकरीबन सभी बाढ़ प्रभावित गांवों के पीड़ितों का है। प्रशासन की ओर से दी जाने वाली राहत सामग्री बुनियादी जरूरत को पूरा नहीं कर पा रही है। हालांकि प्रशासन का दावा है कि वह हर संभव मदद कर रहा है।
जनपद में चार दिनों से टीलों व बाढ़ राहत शिविरों में डेरा डाले करीब 10 हजार ग्रामीणों के पास खाने-पीने और ठौर-ठिकाने के लाले हैं। केन और यमुना में जल स्तर के सामान्य होने पर पीड़ितों ने राहत की सांस तो ली है, पर उनकी समस्याएं कम नहीं हुई हैं। शंकर पुरवा, बरेहटा, लौमर सहित 23 मजरों और दस गांवों में पानी कम हो रहा है, पर महामारी फैलने की आशंका से ग्रामीण भयभीत हैं। इन गांवों में 132 घंटे से बिजली नहीं है। टीलों में बसे ग्रामीण अपने डूबे आशियाने तलाशते रहे और महिलाएं व बच्चे लंच पैकेटों व राहत सामग्री का इंतजार करते रहे।
ग्राम प्रधान रोहित निशाद, सुरेश निशाद, मनोज, चरन आदि ग्रामीणों ने बताया कि नांदादेव और भाथा गांव के बाढ़ पीड़ितों को अब तक कोई राहत सामग्री नहीं मिली है। अमारा गांव से भी चिंताजनक स्थिति सामने आई है। गांव के प्रधान अशोक कुमार और अन्य ग्रामीणों ने बताया कि करीब 12 मकान डूब गए हैं, जिनमें से कई पूरी तरह से गिर चुके हैं। इन लोगों ने आरोप लगाया कि प्रशासन की ओर से न तो किसी ने खबर ली और न कोई राहत किट या मदद दी गई है।
यमुना नदी ने जनपद में करीब डेढ़ दशक बाद ऐसा रौद्र रूप दिखाया है। शनिवार की रात यमुना नदी खतरे के निशान के ऊपर पहुंची तो करीब 20 गांवों में तबाही लेकर आई। लौमर, तारा खजुरी सहित 20 मजरों व गांवों के मकान पानी में समा गए। कुछ लोगों ने इस उम्मीद में छत पर तंबू लगाकर डेरा डाला कि शायद यमुना व केन और न बढ़ें। लेकिन बाद में नावों के जरिए उन्हें भी बाढ़ राहत शिविर और टीलों का सहारा लेना पड़ा। बाढ़ में डूबी जीवन भर की पूंजी व गृहस्थी को छोड़कर तीन दिन रिमझिम बारिश के बीच कीचड़ में बच्चों व महिलाओं ने गुजारा किया। मंगलवार को सुबह से मौसम साफ हुआ और केन व यमुना का जलस्तर सामान्य स्थिति में पहुंच गया तो बाढ़ पीड़ित फिर से गृहस्थी बसाने और राशन सामग्री जुटा कर बच्चों का पेट भरने की जुगत में जुट गए।