बांदा। मनरेगा को लेकर सुप्रीम कोर्ट ने प्रदेश सरकार की खिंचाई बेवजह नहीं की। गांवों में रोजगार मुहैया कराने वाली केंद्र की यह महत्वाकांक्षी योजना बुंदेलखंड के लिए बड़े काम की थी, लेकिन सरकारी मशीनरी की निष्क्रियता से योजना का हाल बेहाल है। समय से भुगतान न होने से मजदूर परेशान हैं।
बांदा जनपद में सबसे ज्यादा 5,56,42,000 रुपये मजदूरी बाकी है। हालांकि यहां इस वर्ष 56 करोड़ 86 लाख रुपये खर्च बताए गए हैं। हमीरपुर के मजदूर एक करोड़ 62 लाख आठ हजार के भुगतान के लिए चक्कर काट रहे हैं।
महोबा में एक करोड़ 44 लाख 21 हजार मजदूरी अदा नहीं की गई है। यहां 16 करोड़ 77 लाख 39 हजार रुपये खर्च किए गए हैं। जालौन में मजदूरों का चार करोड़ 11 लाख 87 हजार रुपये बाकी है। यहां 60 करोड़ 65 लाख 67 हजार रुपये मनरेगा में खर्च हुए हैं।
44 मजदूरों की 77 हजार रुपये मजदूरी बाकी
नरैनी। सूखे के चलते फसलें नहीं हुईं। गांव में मजदूरी भी नहीं मिल रही। ऐसे में मनरेगा मजदूरों को पिछली बकाया मजदूरी की सख्त जरूरत है, लेकिन उन्हें अपनी गाढ़ी कमाई नहीं मिल पा रही।
अतर्रा तहसील के तरसूमा गांव में 44 मजदूर एक साल से मजदूरी मांग रहे हैं। उनकी 77 हजार रुपये मजदूरी नहीं मिली। उधर, नरैनी ब्लाक के आठ गांवों में दो सौ से ज्यादा मजदूरों को भी लगभग पांच लाख रुपये मजदूरी बाकी है। मजदूर ग्राम पंचायत और बीडीओ कार्यालय के चक्कर लगा रहे हैं।
तरसूमा के मजदूर भारती ने बताया कि उसकी खुद की और गुड़िया, सफेदा और लक्ष्मी प्रसाद की मजदूरी एक साल से बकाया है। प्रत्येक को 1872 रुपये मिलना है। इसी तरह रामसांवरे के 624 रुपये नहीं मिले। सभी मजदूरों ने मनरेगा से खेतों में बंधी बनाई थी। उधर, ग्राम पंचायत से मिली जानकारी के मुताबिक मजदूरों की मजदूरी ऑनलाइन भेज दी है, लेकिन मजदूरों के खाते में अब तक पैसा नहीं पहुंचा। ये भटक रहे हैं।