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सरहद के 14 गांव में हो रही महुआ की बरसात

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करतल। जनपद की सरहद से जुड़े मध्य प्रदेश के सीमावर्ती लगभग 14 गांव में इन दिनों आदिवासी और गरीब ग्रामीण परिवार महुआ के फूल जुटाने में जुटे हुए हैं। तड़के से यह क्षेत्र महुआ के फूलों की खुशबू से महक उठता है। आधी रात के बाद पेड़ से टपकना शुरू हुए महुआ का फूल सुबह सड़क और धरती पर सफेद चादर जैसे नजर आते हैं।
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इस क्षेत्र के 24 मजरे और 14 गांवों में अधिकांश परिवार पूरे साल महुआ से बनी विभिन्न व्यंजन से अपना नाश्ता और पेट भरते हैं। अप्रैल माह में महुआ के फूल पेड़ से टपकना शुरू हो जाते हैं। यह तड़के ही गिरते हैं। आधी रात के बाद से ही इन गांवों में पूरा परिवार महुआ बीनने को जंगल और सड़कों पर अपना डेरा डाल देता है। स्वादिष्ट होने के साथ महुआ औषधि का भी काम करता है।
इससे बनाई जाने वाली डुबरी इस क्षेत्र के ग्रामीणों का पसंदीदा व्यंजन है। खासकर देशी महुआ के फूल की विशेष मांग है। दूध, दही, मठा आदि के साथ इसके कई प्रकार के व्यंजन बनते हैं। उधर, कई ग्रामीण परिवारों ने बताया कि वह अपना पेट भरने के लिए महुआ का भंडार घर में करते हैं, लेकिन अक्सर पुलिस इसे शराब का अवैध लहन बताकर नष्ट कर देती है।
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सिंचाई विभाग की आमदनी का साधन है महुआ
करतल। महुआ के फल-फूल यहां सिंचाई विभाग की आमदनी का जरिया भी है। अंग्रेजों के जमाने से यहां एमपी की सरहद में बनी सिंचाई विभाग की कोठी परिसर में दर्जनों भारी-भरकम महुआ के पेड़ हैं। इनमें हर साल भारी मात्रा में महुआ पैदा होता है। सिंचाई विभाग हर साल महुआ के फलों की नीलामी करता है। इससे होने वाली आमदनी सिंचाई प्रखंड तृतीय बांदा के कोष में जमा होती है।
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