नरैनी (बांदा)। सूखे-भूखे बुंदेलखंड में अनाज लुटने
की नौबत आ गई है। बुधवार को नरैनी तहसील के मुकेरा गांव में कार्डधारकों ने
राशन की दुकान लूट ली।
इससे पहले नरैनी-खजुराहो मुख्य मार्ग पर
जाम भी लगाया। कोटेदार ने 50 लोगों के खिलाफ अधिकारियों से शिकायत की है।
कार्रवाई के सवाल पर प्रशासन और आपूर्ति विभाग के अधिकारी देर शाम तक
असमंजस में रहे। फिलहाल पुलिस को कोई तहरीर भी नहीं दी गई है।
नरैनी
तहसील के मुकेरा गांव के कार्डधारकों का कहना है कि उन्हें कई महीने से
राशन नहीं मिला। गांव का सरकारी कोटा वृद्ध महिला झुर्री देवी के नाम है।
वह शारीरिक रूप से कमजोर है।
इसी से बुधवार को उनका कर्मचारी भरत
त्रिपाठी राशन बांट रहा था। इसी बीच घटतौली के आरोप लगने से हंगामा शुरू हो
गया। ग्रामीणों ने सुबह करीब 11 बजे नरैनी-खजुराहो मुख्य मार्ग पर जाम लगा
दिया।
कोटेदार की सूचना पर एसडीएम पुष्पराज सिंह, आपूर्ति
निरीक्षक मोहम्मद याकूब तथा कोतवाली प्रभारी केएन सिंह फोेर्स के साथ मौके
पर आए और राशन बंटवाने का आश्वासन देकर जाम खत्म कराया।
एसडीएम और पुलिस वापस चली गई। इस बीच राशन फिर बंटने लगा, तभी शाम करीब छह बजे लोगों ने दुकान पर धावा बोल दिया।
कोटेदार
का आरोप है कि गांववाले करीब 76 बोरी गेहूं उठा ले गए। हर बोरी में करीब
50 किलो गेहूं था। उस समय दुकान पर आपूर्ति निरीक्षक के साथ ग्राम प्रधान
सीताराम भी थे।
प्रधान ने बताया कि गांववालों को रोकने के प्रयास
में उनके अंगूठे में चोट आ गई। कुछ ग्रामीणों का कहना था कि कोटेदार ने
भारी मात्रा में राशन ब्लैक कर लिया था।
इसी से कार्डधारकों में
आक्रोश था। कोटेदार का कहना है कि उसने राशन लूटने की सूचना एसडीएम को दे
दी है। एसडीएम का कहना है कि उन्हें कोई तहरीर नहीं मिली। आपूर्ति निरीक्षक
का कहना है कि वह इस बारे में एसडीएम सहित अपने अधिकारियों से बातचीत कर
रहे हैं। अग्रिम कार्रवाई के लिए अधिकारी ही निर्णय लेंगे।
लूटा नहीं, भूखोें ने हक छीना है- नसीमुद्दीन
बांदा।
विधान विधान रिषद में नेता प्रतिपक्ष और बसपा के राष्ट्रीय महासचिव
नसीमुद्दीन सिद्दीकी ने कहा है कि मुकेरा गांव में हुई घटना को राशन की लूट
नहीं कहा जा सकता, बल्कि भूखे लोगों ने अपना हक छीना है।
यह मामला
8 मार्च से शुरू हो रहे विधान परिषद और विधान सभा के सदन में उठाया जाएगा।
वह बृहस्पतिवार को बांदा आए थे। उन्होंने कहा कि इस घटना से केंद्र और
राज्य सरकारें शर्म करें कि लोगों को दो जून की रोटी नहीं मिल पा रही है।
प्रधानमंत्री और मुख्यमंत्री को सत्ता में रहने का हक नहीं है।
खुद भूखे तो पंसारियों को कहां से दें अनाज
बांदा।
कुदरत की मार से बुंदेलखंड के रीतरिवाज भी बदल गए हैं। मुकेरा गांव की
पुष्पा सविता सात साल से गांव में परचून की दुकान चला रही हैं।
वह
बताती हैं कि जब तक खेती ठीकठाक थी तो रोजाना गांव के लोग सौदा खरीदने आते
और कीमत में गेहूं, चावल, चना, सरसों आदि दे जाते थे। रोजाना लगभग 20 किलो
अनाज आ जाता था। इसे बेचकर दुकान के साथ घर का खर्च भी चल जाता था। अब
हालात बदल गए हैं।
दो किलो भी अनाज नहीं आ रहा। न ही उतनी बिक्री
होती है। गांववालों के चूल्हे खुद ठंडे हैं तो पंसारी को अनाज कहां से दें।
अपना घर चलाने के हिए उन्हें ही इधर-उधर से कर्ज लेना पड़ रहा है।
छोटी सी दुकान के बावजूद एक हजार रुपये से ज्यादा की उधारी गांव वालों पर पड़ी है। मजबूरन पति को मजदूरी के लिए परदेश भेज दिया है।