बांदा। सरकारों ने सूबों की सरहद बांध दी, लेकिन कुदरत ने कोई हदबंदी नहीं की। यूपी और एमपी में बुंदेलखंड के हालात एक जैसे हैं। जो मौसम की मार यूपी के बुंदेलियों पर पड़ रही है, वही मार एमपी के बुंदेली भी झेल रहे हैं। भीषण सूखे के हालात ने दोनों राज्यों में बंटे बुंदेलखंड के लगभग एक दर्जन जिलों में महाराष्ट्र के लातूर जैसे हालात पैदा कर दिए हैं। यहां पानी के लिए त्राहि-त्राहि मची है। कुदरत के इस कहर के आगे दोनों राज्यों की सरकारें बौनी साबित हो रही हैं।
यूपी के बुंदेलखंड में चित्रकूट जिले के पाठा क्षेत्र में प्रदेश सरकार ने वर्ष 1973 में एशिया की सबसे बड़ी पेयजल परियोजना मंजूर की थी। इसकी लागत तब 196.485 लाख रुपये थी। इस परियोजना से लगभग पौने चार सौ गांवों में पाइप लाइन के जरिये पानी दिया जाना था, लेकिन जल संस्थान अपनी इस घोषणा पर खरा नहीं उतरा।
जल संस्थान का दावा है कि 234 गांवों और तीन नगरीय क्षेत्रों में पाइप लाइन से पानी दिया जा रहा है, जबकि हकीकत कुछ और है। पाठा क्षेत्र में देवांगना घाटी के रामपुर, रुकमा खुर्द, ददरी, मडै़य्यन खुर्द आदि गांवों में डाली गई पाइप लाइनों में आज तक एक बूंद पानी नहीं आया। यह लाइनें जंग खाकर बर्बाद हो रही हैं।
जंगली जानवरों तक को पानी नसीब नहीं हो रहा है। रामपुर गांव की सुमित्रा और कल्लू ने पाइप लाइन की तरफ देखा और रुआंसे हो गए। किसान नेता शिवनारायण सिंह परिहार और ग्रामीण हृदेश सिंह ने कहा कि स्थितियां इतनी खराब हैं कि जान बचाना मुश्किल पड़ रहा है।
इन गांवों में भ्रमण को पहुंचे प्रवास सोसाइटी के आशीष सागर ने बताया कि यही हालात सीमा से जुड़े मध्य प्रदेश के बुंदेलखंड के हैं। सरहदी पन्ना शहर से पांच किलोमीटर दूर बसे गोंड आदिवासी बस्ती, मानस नगर और मांझा में लातूर जैसा नजारा है। गड्ढे खोदकर उनमें जमा हो रहा प्रदूषित पानी महिलाएं और बच्चे कपड़े से छान कर घर ला रहे हैं। पन्ना का धर्म सागर, लोकपाल सागर, बेनी सागर आदि सूख चुके हैं।