विंध्य पर्वत माला के अंतिम छोर पर बना दुर्ग ऐतिहासिक और पौराणिक महत्व का है
बांदा। विंध्य पर्वत माला के अंतिम छोर पर सुनसान चट्टानी पहाड़ पर स्थित पौराणिक कालिंजर दुर्ग ऐतिहासिक ही नहीं पौराणिक महत्व भी रखता है। कई राजाओं की वीरता के साक्षी इस दुर्ग में नीलकंठ महादेव भी विराजमान हैं। किले की फिजाओं में राजाओं की वीरता की कहानियों के साथ महादेव की महिमा भी गूंजती रहती है। यही वजह है कि इस बार मन की बात में पीएम मोदी ने इस दुर्ग का भी जिक्र किया है। उम्मीद है कि अब दुर्ग के अच्छे दिन आएंगे।
भारतीय इतिहास में सामरिक दृष्टि से कालिंजर किला काफी अहम है। यह भारत के सबसे विशाल और अपराजेय किलो में माना जाता है। किले में स्मारकों और मूर्तियों का अंबार है। पांचवीं सदी में बनवाया गया यह किला चंदेल वंश के शासन काल की भव्य वास्तुकला का बेहतरीन नमूना है। किले में कई भवन और मंदिर हैं।
कालिंजर दुर्ग भगवान शिव का निवास स्थान माना जाता है। इसमें नीलकंठ महादेव का करीब 1000 साल पुराना गुप्त कालीन मंदिर है। कई पौराणिक घटनाएं इस दुर्ग से जुड़ी हैं। बताया जाता है कि महादेव ने यहीं पर विषपान कर काल की गति को मात दी थी। मंदिर के पीछे की तरफ पहाड़ काटकर पानी का कुंड बनाया गया है। इसमें बने स्तंभों और दीवारों पर प्रतिलिपि है। मंदिर के ऊपर पहाड़ है, जहां से पानी रिसता है। इतिहासकार बताते हैं कि शेरशाह सूरी की मृत्यु 22 मई 1545 को कालिंजर किले की घेराबंदी के दौरान ही हुई थी। (संवाद)