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जैविक शहद की खेती की ओर रुझान

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jaivik sahad ki oor rujhan - फोटो : BANDA
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बांदा। बुंदेलखंड में जैविक खेती के साथ ही अब किसानों का रुझान जैविक शहद (आर्गनिक हनी) की तरफ बढ़ रहा है। यहां साल के पांच महीनों में शहद उत्पादन की अच्छी संभावनाएं हैं। यह कम लागत में अधिक मुनाफे वाला व्यवसाय है। खेत में ही मधुमक्खियां पालकर किसान अपनी आमदनी का जरिया बढ़ा सकते हैं। यहां के प्रगतिशील किसान ने इसकी बानगी भी कर दिखाई है।
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जैविक शहद उत्पादन में यूरोपियन मधुमक्खी (एपिस मैलीफेरा) की खास भूमिका है। बांदा जनपद के छनेहरा गांव में स्थित बुंदेलखंड जैविक कृषि फार्म में इन दिनों सरसों के खेत में प्रगतिशील युवा किसान मोहम्मद असलम यूरोपियन प्रजाति की एपिस मैलीफेरा मधुमक्खी पाल रहे हैं। उन्होंने मक्खियों की 14 कालोनियां (पालन डिब्बे) लगाएं हैं। मधुमक्खी आसपास सरसों के फूलों से रस जुटाकर डिब्बों में रखे छत्तों में शहद बना रहीं हैं। कृषक असलम बताते हैं कि अन्य प्रजातियों की तुलना में यह मक्खी काफी शांतिप्रिय है। बहुत कम आक्रामक होती है। अधिक मेहनत करके अधिक शहद तैयार करती है। बताया कि उन्होंने खेत में मधुमक्खी पालन की लघु इकाई पिछले माह पहली जनवरी से कृषि विश्वविद्यालय और कृषि विज्ञान केंद्र के सहयोग से शुरू किया है। मात्र एक माह में शुद्ध सरसों का 23 किलो शहद का उत्पादन हुआ है। शुद्ध शहद की बाजार में कीमत 300 रुपये प्रति किलो से ज्यादा ही है।
नवंबर से मार्च तक 40 किलो शहद उत्पादन
बुंदेलखंड में जैविक शहद किसानों के लिए काफी फायदेमंद कारोबार है। किसान असलम बताते हैं कि पूर्ण विकसित और स्वस्थ एक यूनिट से एक सीजन में 30 से 40 किलो शहद लिया जा सकता है। फसलों में पर्याप्त मात्रा में पोलेन व नेक्टर मिलने पर हर सप्ताह शहद निकाला जा सकता है। बुंदेलखंड में पूरे सीजन नवंबर से मार्च तक सरसों, अरहर, मटर, चना आदि फसलें होतीं हैं। इनमें पर्याप्त पोलेन व नेक्टर रहता है। इस सीजन में 20 से 40 किलो तक शहद का उत्पादन किया जा सकता है। अप्रैल से जून तक करंज, बबूल, नीम, मकई, ज्वार, बाजरा आदि की खेती रहती है। क्षेत्रीय उपलब्धता के अनुसार, इनसे भी पर्याप्त शहद उत्पादन लिया जा सकता है। कहा कि अगर आसपास क्षेत्रों में यह फसलें नहीं है तो मधुमक्खियों के पलायन (माइग्रेट) का लाभ लिया जा सकता है।
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बुंदेलखंड में किसानों को दी जाएगी ट्रेनिंग
असलम ने बताया कि उनका उद्देश्य बुंदेलखंड में तैयार जैविक शहद की राष्ट्रीय और अंतर्राष्ट्रीय बाजार में पहचान स्थापित कराना और इसे बाजार देना है। बुंदेलखंड में कई किसानों को इसकी ट्रेनिंग देकर ग्रुप या क्लस्टर फार्मिंग कराने की योजना बनाई जा रही है। शहद उत्पादन के साथ इस व्यवसाय में छत्ता गाेंद (प्रोपोलिस), मोम (रॉयल जैली) पराग कण आदि की भी मांग भारत समेत विदेशों तक है। यह अच्छे मूल्य पर बिकते हैं।
छत्ते में श्रमिक मधुमक्खियां सबसे ज्यादा
छत्ते में श्रमिक मधुमक्खियां सबसे ज्यादा होती हैं। इनकी पहचान ये है कि इनके पेट में कई समानांतर धारियां होती हैं। यह डंक मारने वाली मधुुमक्खी है। छत्ते/यूनिट में यह जितनी ज्यादा होंगी उतना अधिक शहद होगा। हरेक छत्ते में एक नर मधुुमक्खी भी होती है। यह मधुुमक्खी रानी का गर्भाधान भी करता है।
फूलों की खेती के साथ ज्यादा फायदेमंद
मधुमक्खी जहां पाली जाएं, उसके आसपास की जमीन साफ होनी चाहिए। बड़े चींटे, मोम भक्षी कीड़े, छिपकली, चूहा, गिरगिट, भालू इत्यादि इनके दुश्मन हैं। पालन के लिए लकड़ी का बाक्स, बाक्स फ्रेम, मुंह पर जालीदार ढक्कन, दस्तानें, शहद रिवूमिंग मशीन आदि सामग्री की जरूरत होती है। फूलों की खेती के साथ और ज्यादा फायदेमंद व्यवसाय होता है। मधुमक्खी पालन के लिए जनवरी से मार्च का समय सबसे उपयुक्त है।

jaivik sahad ki oor rujhan- फोटो : BANDA

jaivik sahad ki oor rujhan- फोटो : BANDA

jaivik sahad ki oor rujhan- फोटो : BANDA

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