बांदा। शायरों ने रविवार का दिन शेरों-शायरी सुनने और सुनाने में बिताया। छिपटहरी स्थित शायर डा.मंसूर राज के आवास पर तरही मुशायरे की नशिस्त हुई। ‘राहे उल्फत में जरा खुद को मिटाकर देखो’ मिसरा तरह पर शायरों ने शेर पेश किए।
बाराबंकी के शायर रेहान ने पढ़ा-‘वह तो बैठा ही है हर इक पे करम करने को, तुमको फुरसत जो मिले हाथ उठाकर देखो’। महोबा के शायर अख्तर का शेर था-‘जिस तरह जिंदगी मजदूर बसर करता है, आप फुटपाथ पर इक रात बिताकर तो देखो’। हमीरपुर के शायर अनवर ने कलाम सुनाया-‘सारी दुनिया तुम्हे रंगीन नजर आएगी, अपनी आंखों में हसीन ख्वाब सजाकर देखो’। गुलजार बांदवी ने कहा-‘एक दुुनिया नजर आएगी अंधेरे में बसी, तुम उजालों से कभी दूर जाकर तो देखो’।
शरीफ का शेर था-‘इकपल में तेरी तकदीर बदल जाएगी, रब के दरबार में सर अपना झुकाकर देखो’। सईद वारसी ने पढ़ा-‘हम हकीकत से निकल आए हैं फसाने की तरफ, गर यकीं न हो तो कुरआन उठाकर देखो’। डा.खालिद इजहार ने शेर सुनाया-‘अपनी भूली हुई तारीख उठा कर देखो, जो कभी था वही किरदार बनाकर देखो’। असगर बांदवी ने सुनाया-‘बीच आंगन में है दीवार जो नफरत की खड़ी, इसमें उल्फत की जरा खिड़की लगाकर देखो’।
मुशायरे का संचालन कर रहे नजरे आलम ने पढ़ा-‘यूं तो दुनिया को गले रोज लगाते हो नजर, बूढ़े मां-बाप को सीने से लगाकर देखो’। मुशायरे की सदारत कर रहे हकीम बशीर तालिब ने अपने शेर से मुशायरे का समापन किया-‘फलसफा जीस्त का फिर होगा समझना आसां, खुश्क पत्तों को कभी आप उठाकर देखो’। इनके अलावा लतीफ बांदवी, हमराज बांदवी, तारिक अजीज, रजत कमल, हसरत फरीदी, नईम बांदवी, नश्तर बांदवी ने भी शेर सुनाए। शुरुआत खादिम बाराबंकी की नात से हुई। बाबा फरीद इत्यादि शामिल रहे।