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बाढ़ बहा लाई बालू, पट्टाधारकों की भरेंगी जेबे

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बांदा। मानसूनी मौसम खत्म होने के बाद अब खदानें आबाद होने के दिन आ गए हैं। इस वर्ष केन नदी में काफी दिनों तक बाढ़ रही। बाढ़ से भले ही सैकड़ों गरीबों के मकान धराशायी हो गए और किसानों की हजारों एकड़ खेती चौपट हो गई, लेकिन बालू कारोबारियों के लिए बाढ़ फायदेमंद रही। भारी मात्रा में बहकर आई बालू से खदानें भर गई हैं। खनिज कार्यालय में बालू कारोबारियों की महफिलें सजने लगी हैं। देर रात तक यह कार्यालय गुलजार हो रहा है।
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मानसूनी मौसम में हर साल 30 जून को खदानों में खनन बंद हो जाता है। तीन माह बाद एक अक्तूबर को फिर चालू होती हैं। लगभग ढाई दर्जन खदानें चलती रहीं। रात-दिन पोकलैंड और लिफ्टर मशीनों से हुए खनन में न सिर्फ खदानें बल्कि नदी की तलहटी तक खोखली हो गईं। कई खदानों में बालू का सफाया हो जाने से पट्टेधारकों ने निर्धारित अवधि से पहले ही खदानें सरेंडर करने की कवायदें शुरू कर दीं। अब मानसूनी मौसम खत्म हो गया है। अगस्त और सितंबर महीनों में केन और यमुना नदियों में जमकर बाढ़ आई। बाढ़ खूब बालू बहाकर लाई। खनन से खोखली हो चुकी खदानें फिर बालू से भर गईं। ऐसे में पट्टाधारक जल्द ही खनन शुरू कराने को बेताब हैं। दूसरी सच्चाई यह भी है कि खनिज विभाग के अभिलेखों में भले ही कहीं खनन शुरू न हुआ हो, लेकिन तमाम खदानों यहां तक की मंडल मुख्यालय के आसपास इर्दगिर्द खनन का खेल रात-दिन जारी है।
पट्टाधारकों से ही करते हैं खनिज अधिकारी बात
यहां के खनिज अधिकारी राजेश सिंह लंबे अवकाश पर हैं। उनके स्थान पर लखनऊ खनिज निदेशालय से वीरेंद्र प्रताप सिंह को भेजा गया है। खास बात यह है कि सिर्फ बालू कारोबारियों से घिरे रहना और बात करना पसंद करते हैं। मीडिया को खनिज और खनन संबंधी जानकारी देने में परहेज करते हैं। इनके बारे में यह भी मशहूर है कि डीएम के बाहर जाते ही ये अपना सीयूजी फोन बंद कर लेते हैं। उधर, इस बारे में प्रभारी अधिकारी खनिज/अपर जिलाधिकारी संतोष बहादुर सिंह का कहना था कि प्रभारी खनिज अधिकारी अगर मीडिया से बात नहीं कर रहे तो वे उन्हें मनाने नहीं जाएंगे। शासन की मंशा के मुताबिक खनन में पारदर्शिता बरकरार रखना उनकी जिम्मेदारी है।
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हर खदान में धर्मकांटा जरूरी
बांदा। सभी बालू खदानों में धर्मकांटा लगाया जाना अनिवार्य कर दिया गया है, लेकिन अभी किसी पट्टाधारक ने अपनी खदान में इस आदेश पर अमल नहीं किया। धर्मकांटा लगाए जाने के पीछे सरकार की मंशा ओवरलोडिंग रोकने की है। बालू भरे ट्रकों का वजन खदान में ही होगा, ताकि ओवरलोड ट्रक सड़कों पर न पहुंच पाएं। फिलहाल धर्मकांटा लगाए बगैर अपनी खदानें चालू करने के लिए कई खदान पट्टाधारक प्रभारी खनिज अधिकारी के इर्दगिर्द मंडरा रहे हैं।
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