एचआईवी-एड्स से बचाव ही इसका इलाज है। इसके प्रति जागरूकता को चलाई जा रही सरकारी और स्वयंसेवी संगठनों की मुहिम पर लाखों खर्च के बाद भी इस जानलेवा रोग पर लगाम नहीं लग पा रही। प्रदेश में घोषित पांच हाई रिस्क जोन में बांदा भी शामिल है। दरअसल लोगों की जाने-अनजाने में हो रही ‘भूल’ उन पर ही भारी साबित हो रही है। चालू वर्ष में अब तक 16 एड्स मरीज चिह्नित किए जा चुके हैं। इनमें 10 पुरुष और छह महिलाएं हैं। बांदा जनपद में एड्स मरीजों की संख्या अब बढ़कर चार सैकड़ा से ज्यादा हो गई है। दो माह पूर्व मटौंध क्षेत्र के एक गांव में एड्स पीड़ित व्यक्ति की मौत हो चुकी है।
बुंदेलखंड में भी एचआईवी और एड्स तेजी से बढ़ रहा है। मजदूरी के लिए महानगरों को पलायन करने वाले लोग यह जानलेवा मर्ज अपने साथ लेकर आ रहे हैं और गांव-गांव में यह मर्ज फैला रहे हैं। पिछले वर्ष 2013 में यहां जिला अस्पताल में जांच पड़ताल के दौरान 49 एचआईवी मरीज पाए गए थे। इस वर्ष अब तक 11 माह में 16 मामले एड्स के उजागर हो चुके हैं। इनमेें 10 पुरुष और छह महिलाएं हैं। हाल ही करीब दो महीने पूर्व मटौंध क्षेत्र के एक गांव में एचआईवी पीड़ित एक व्यक्ति की मौत हो चुकी है। रोजाना जिला अस्पताल में 25 से 30 मरीजों की जांच की जा रही है। हर माह चार सैकड़ा से ज्यादा एड्स संभावित मरीजों की जांच होती है। जिला अस्पताल मेें ब्लड बैंक प्रभारी और डॉ.एसके वाजपेई ने बताया कि शासन द्वारा प्रदेश में घोषित पांच हाई रिस्क जनपदों में बांदा भी शामिल है। ब्लाकवार घोषित हाई रिस्क जोन में बबेरू प्रथम, नरैनी द्वितीय और कमासिन क्षेत्र तृतीय स्थान पर है। उन्होंने बताया कि बबेरू और नरैनी क्षेत्र से ज्यादा लोग महानगरों को पलायन कर रहे हैं। जांच वाले हर 100 लोगों में पांचवां व्यक्ति बबेरू या नरैनी का होता है।