बारिश और ओलावृष्टि से बर्बाद हुई फसलों के बदले में प्रदेश सरकार से मुआवजे के नाम पर जो मिल रहा है उसमें किसान अपने खेतों में सूख गई फसल का मलवा-चारा हटवाने की मजदूरी भी नहीं जुटा पा रहे हैं। ऐसे में अगली फसल के लिए जुताई और बुआई पर ब्रेक लग सकता है।
बुंदेलखंड में गेहूं की फसल पर करीब 29,000 रुपये प्रति हेक्टेअर लागत आती है। सरकार अधिकतम 9,000 रुपये और असिंचित किसानों को सिर्फ 4500 रुपये प्रति हेक्टेयर मुआवजा दे रही है। अफसर कहते हैं कि सरकार ने जो मानक तय कर दिया है उसमें कोई घटा-बढ़ी करने का उन्हें हक हासिल नहीं है।
रबी की फसल में किसानों ने गेहूं और चने की खूब बुआई की थी। बारिश और ओलावृष्टि से पूरे चित्रकूटधाम मंडल में 6,43,677 हेक्टेअर से ज्यादा क्षेत्रफल की फसल को नुकसान पहुंचा है। गेहूं में यहां जुताई-बुआई, बीज, खाद, सिंचाई, कटाई-मढ़ाई, मजदूरी इत्यादि में प्रति हेक्टेअर करीब 29,000 रुपये किसानों ने जेब से खर्च किए थे।
इसके अलावा खुद रात-दिन की मेहनत-मशक्कत अलग है। इसी तरह चना मेें करीब 27,000 हजार रुपये प्रति हेक्टेअर खर्च हुआ। मौसम की मार से मायूस किसान अब सरकारी मदद की ओर टकटकी लगाए हैं। मुआवजा ही उनका मुकद्दर बन गया है, लेकिन सरकार ने मुआवजे की जो दरें तय की हैं वह ‘ऊंट के मुंह में जीरा’ से ज्यादा नहीं है।
फौरी तौर सरकार सिंचित क्षेत्र में 9,000 रुपये और असिंचित में मात्र 4500 रुपये प्रति हेक्टेअर मुआवजा दे रही है। जिन गिने-चुने किसानों को सरकार की यह मदद हाथ लग गई है उनका कहना है कि इसमें तो दोबारा जुताई भी नहीं हो पाएगी।