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घर वापसी के बाद भी झेल रहे बेरोजगारी का दंश

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सुशील कुमार। - फोटो : BANDA
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बांदा। रोजी-रोटी की तलाश में महानगरों के लिए पलायन सिर्फ गांव के बेरोजगारों ने ही नहीं किया। काम के जुगाड़ में शहरी भी अपना घर छोड़कर परदेस कूचकर गए थे। लॉकडाउन हुआ तो उन पर मुसीबतों का पहाड़ टूट पड़ा। शुरुआत में तो यह सोचकर रुक गए कि कुछ दिन बाद हालात सामान्य हो जाएंगे, लेकिन स्थिति जब और खराब हुई तो उन्हें अपना शहर और घर याद आया।
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कोई वाहनों का जुगाड़ कर तो कोई पैदल ही चल पड़ा। रास्ते में जो वाहन मिला उसी पर सवार हो लिए। कहीं खाने को मिला तो खा लिए, नहीं तो ऐसे ही चल पड़े। ऐसे ही कुछ शहरी पलायित मजदूर लॉकडाउन की मार सहकर यहां लौटे हैं। उन पर क्या बीती? शहरी प्रवासी मजदूरों की कहानी, उन्हीं की जुबानी।
आधी रोटी खाएंगे, परदेस कमाने नहीं जाएंगे
बांदा। मां ने पैसा न भेजा होता तो भूखे ही मर जाते। बाबा की यह नसीहत रह-रहकर याद आती रही कि- ‘आधी रोटी खाएंगे, परदेस कमाने नहीं जाएंगे’।
यह दर्द सूरत से लौटे बांदा शहर के अतर्रा चुंगी निवासी सुशील कुमार ने बयां किया। सुशील कुमार सूरत स्थित साड़ी की फैक्ट्री में काम करता था। उसने बताया कि फैक्ट्री बंद होने के बाद 27 अप्रैल को किसी तरह जुगाड़ कर यहां घर लौट आया। फिलहाल यहां भी अभी कोई रोजी-रोटी का जुगाड़ नहीं लग सका है, लेकिन दोबारा परदेस जाने से तोबा कर ली है।
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शादी में मिली अंगूठी बेचकर वतन वापस आए
शहर के आजाद नगर का फयाजुल हसन मुंबई में रेडीमेड कपड़े बनाने वाली कंपनी में काम करता था। लॉकडाउन में फैक्ट्री बंद हुई तो हालात बिगड़ गए। बताया कि खाने के लाले पड़ गए।
उधर, बांदा में रह रही पत्नी अंजुम आए दिन फोन पर उसके हालात सुनकर रोती थी। बताया कि वापस लौटने के लिए किराया भी नहीं था। ऐसे में उसने अपनी शादी में मिली सोने की अंगूठी औने-पौने दामों में बेचकर किराया जुटा और 27 अप्रैल को बांदा आ गया। फिलहाल यहां बेरोजगार है। आगे क्या होता है देखा जाएगा।
काम के साथ कंपनी ने कमरा भी छीना
शहर के अलीगंज निवासी गोविंद सिंह पिछले वर्ष सितंबर से बंगलूरू में शटरिंग का काम कर रहा था। लॉकडाउन में कंपनी बंद होने पर बची पूंजी से कुछ दिन खर्च चला। कंपनी ने रहने को दिया कमरा खाली करा लिया। इस बीच सात हजार का कर्ज चढ़ गया।
बांदा से पत्नी ने 9 हजार रुपये भेजे तो 7 हजार कर्ज अदा किया और दो हजार रुपये लेकर वापस चल पड़ा। तीन दिन पैदल चलना पड़ा। फिर भी ट्रक आदि में बांदा आया। गोविंद को यहां भी कोई काम नहीं मिला है, लेकिन अब वह पलायन नहीं करेगा।

फयाजुल।- फोटो : BANDA

ोविंद सिंह।- फोटो : BANDA

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