बांदा। मुशायरे की महफिल में नातिया कलामों की धूम
रही। शायरों ने पैगंबरे इस्लाम की शान में शेरों की झड़ी लगा दी। देर रात
तक चले मुशायरेे मेें कुछ बाहरी शायर भी शरीक रहे।
शनिवार की रात
मर्दननाका स्थित डा. खालिद इजहार के आवास पर मुशायरे की शुरूआत असगर
रब्बानी ने- जब कसाहत में पयंबर की मैं लिखता हूं गजल, हाथ बांधे हुए तहसीन
खड़ी रहती है, से की।
इलाहाबाद से आए शायर जीशान रब्बानी ने पढ़ा- मस्जिदे इश्क में इरफां की नमाजें हो नसीब, रूह सजदे करे हो दिल का मुसल्लाअल्ला।
मेजबान
डॉ.इजहार ने सुनाया- जहां को आप सा कोई अबद तक मिल न पाएगा, न सानी है
मोहम्मद का न साया है मोहम्मद का। बुजुर्ग शायर निश्तर बांदवी ने पढ़ा-
तौबा-तौबा कहां हम कहां मुस्तफा, ये बदन खाक का वो बदन नूर का।
तारिक अजीज ने सुनाया- तूफां की रहे जद में हम फिर भी नहीं डूबे, जाने क्या लिखा मां ने तारिक के सफीने में।
नातिया मुशायरे में कलाम पेश करने वाले अन्य शायरों में शरीफ बांदवी, गुलजार बांदवी, हकीम बशीर तालिब भी शामिल थे।
नजरे
आलम, डॉ.शरीफ, सब्बू पहलवान, अजीज बेग, बबलू, हाजी इदरीश, हाजी सिद्दीक,
अल्लारक्खू वारसी, चुन्ना, शकील, समी मंसूरी भी शामिल रहे।