बुंदेलखंड में मनरेगा के जरिए गांवों की तस्वीर और मजदूरों की तकदीर बदलने के अरमान दशकभर बाद भी अधूरे हैं। दो फरवरी 2006 को लागू हुई महात्मा गांधी राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार गारंटी योजना (मनरेगा) सिर्फ अफसरों एवं ठेकेदारों की भाग्य विधाता रही। एक दशक में बुंदेलखंड में 33 अरब से ज्यादा रुपये खर्च किए गए। फिर भी करीब 22 लाख मजदूरों का पलायन हुआ है।
सरकारी आंकड़ों में बुंदेलखंड के सातों जिलों मेें करीब 24 लाख मजदूरों ने मनरेगा के जाब कार्ड हासिल किए हैं लेकिन किसी परिवार की माली हालत नहीं सुधरी है। अमर उजाला ने सूखे से कराहते बुंदेलखंड में मनरेगा और मजदूरों की स्थिति का जायजा लिया तो जमीनी हकीकत चौंकाने वाली मिली। पेश है बुंदेलखंड में मनरेगा की हकीकत बयां करती एक रिपोर्ट:
साल दर साल पड़े सूखे की वजह से इस साल मनरेगा में काम की डिमांड बढ़ी है, लेकिन समय पर मजदूरी का भुगतान नहीं होने से मजदूर परेशान हैं। हालत यह है कि तमाम मजदूरों ने अपने हिस्से की मजदूरी लिए बगैर ही गांव छोड़ दिया। ऐसे मजदूरों की मजदूरी का पैसे अधिकारियों एवं कर्मचारियों की जेब में जाना तय है। इसके लिए अलग-अलग तिकड़म की जाती है।
हमीरपुर जिले के मोहदा कस्बे से आगे बढ़ते ही खेतों में धूल उड़ती नजर आती है। यहां से बुंदेलखंड की वास्तवित तस्वीर दिखनी शुरू हो जाती है। मोदहा- बिंवार मार्ग पर आगे बढ़ने पर खेतों में मनरेगा के तहत कार्य करते हुए दर्जनभर मजदूर दिखते हैं। नजदीक जाने पर मजदूर काम छोड़कर एकजुट हो जाते हैं। सभी की बस एक ही शिकायत है कि पखवारेभर से काम कर रहे हैं, लेकिन मजदूरी नहीं मिली।
काम कर रहे रिलौली गांव निवासी प्यारे लाल कहते हैं कि समय से मजदूरी नहीं मिलने की वजह से उनके भाई हरिओम ने काम छोड़ दिया और वह कानपुर चला गया। उन्हें 20 दिन से मजदूरी नहीं मिली है। ऐसे में खाने का संकट है। गांव में तमाम कार्य जेसीबी से कराने की भी शिकायत मिलती है। कुछ ऐसी ही शिकायत रतवा गांव में भी मिलती है। कानपुर- सागर हाईवे पर खन्ना थाने के बगल से जाता है रतवां गांव का रास्ता।
हाईवे से करीब तीन किलोमीटर दूर बसे रतवा गांव के चारों तरफ खाली खेत पड़े हैं। गांव में घुसते ही खुदा हुआ तालाब मिलता है। इस तालाब की खुदाई मनरेगा के तहत कराई गई है। गांव के ही दिनेश स्नातक तक पढ़ाई कर चुके हैं। खेत में बुवाई नहीं हुई तो खाने के लाले हैं। इन्होंने 20 दिन तक मनरेगा के तहत तालाब खुदाई की। पैसा देने की बारी आई तो ग्राम प्रधान और सेक्रेटरी ने खाते में पैसा भेजने की बात कह कर पल्ला झाड़ लिया। दिनेश और रविशंकर ने अपने साथ काम करने वाले अन्य कुछ युवकों के साथ एसडीएम से शिकायत की। उन्होंने जल्द से जल्द भुगतान का भरोसा दिया। लेकिन भेरोसे से भूख नहीं मिलती। इस वजह से दिनेश जैसे तमाम युवक शहर जाने को विवश है। कुछ ही स्थिति महोबा के चंदपुरा में भी मिलती है।
महोबा- खजुराहों मार्ग पर स्थित इस गांव में मनरेगा के तहत मेड़बंदी हुई। भान सिंह की मानें तो उन्होंने 10 दिन तक मेड़बंदी में काम किए, लेकिन माहभर बीतने के बाद भी भुगतान नहीं हुआ। अब शहर जाने की सोच रहे हैं। इस बावत ग्राम प्रधान पति बाल किशन बताते हैं कि मनरेगा की मजदूरी भुगतान के लिए वह बीडीओ से लगातार संपर्क कर रहे हैं। कागजी कार्रवाई में देर हो रही है।जल्द से जल्द भुगतान कराया जाएगा।