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सरकार से निराश किसानों ने खुद बनाई गोशाला

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कैरी गांव में किसानों द्वारा खुद बनाई गई गोशाला। - फोटो : BANDA
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बांदा। आधा दर्जन से ज्यादा सरकारी योजनाएं अन्ना मवेशियों से किसानों को कोई राहत नहीं दे पा रहीं। ऐसे में मशक्कत और गाढ़ी कमाई से तैयार कर रहे रबी की फसल को बचाने में किसान खुद आगे आए हैं। इसकी ताजी मिसाल बिसंडा क्षेत्र का कैरी गांव है। प्रशासन से लगातार फरियादें करके निराश हो चुके किसानों ने मिलजुल कर गांव में अस्थायी गोशाला बना ली है। इसमें भूमि से लेकर अन्य सारी व्यवस्थाएं किसानों ने खुद की हैं। लगभग डेढ़ सौ अन्ना पशुओं को इस गोशाला में संरक्षित कर अपनी खेती बचा रहे हैं।
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कैरी गांव में दो सौ से ज्यादा अन्ना मवेशियों ने यहां के किसानों की नींद हराम कर रखी है। लगभग हरेक किसान ठंड, बारिश और गर्मी के मौसमों में घर-द्वार छोड़कर खेतों में दिन-रात गुजार कर फसलों की रखवाली कर रहा है। इन दिनों रबी की फसल की बुवाई हुई है। किसान फसल बचाने के लिए अभी से रात-दिन खेत में डेरा डाले हैं। इसके बाद भी अन्ना पशुओं से खतरा बरकरार था। इस गांव वाले एकजुट और एक राय हुए। गांव के किसान शिवविलास उर्फ बिहारी पटेल ने अपनी उपजाऊ जमीन गोशाला के लिए सौंप दी है।
इसमें चारों तरफ लोहे के तार और खंभे लगाकर बैरीकेडिंग की गई है। पशुओं को पानी के लिए पुख्ता टंकी बनाई जा रही है। इसमें लगभग 50 हजार रुपया खर्च किया है। गांव के सभी किसान इसमें सहयोगी और भागीदारी कर रहे हैं। किसानों ने बताया कि लगभग डेढ़ सौ पशुओं को अब तक गोशाला में लाया जा चुका है। दिन में ये छुट्टा रहते हैं। शाम होते ही सभी को गोशाला में बंद कर दिया जाता है। इनके चारा-भूसा, पानी की व्यवस्था की गई है। समाजसेवी पीसी पटेल जनसेवक (भदेहदू) ने बताया कि ग्रामीणों ने चेतावनी दी है कि गोशाला संचालन के लिए उन्हें सरकारी मदद नहीं मिली तो वे सारे अन्ना मवेशियों को सरकारी स्कूलों में बंद कर देंगे। गोशाला स्थापना में ग्राम प्रधान राकेश पटेल, गोशाला संचालक शिवविलास पटेल, अरुण कुमार पटेल (कोर्रा खुर्द), देशराज पटेल, श्यामलाल, धर्मपाल पटेल, रामशरण वर्मा आदि शामिल हैं।
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चित्रकूटधाम मंडल में अन्ना पशु (पशुपालन विभाग के आंकड़े)
जिला अन्ना पशु
बांदा 69,858
चित्रकूट 55,300
हमीरपुर 47,450
महोबा 40,993
योग 2,13,651
पशु आश्रय केंद्र में जुलाई से अब तक खर्च धनराशि
जनपद आश्रय केंद्र संरक्षित पशु खर्च राशि
बांदा 144 19052 54,42,547
चित्रकूट 271 27495 1,17,13,050
महोबा 159 24685 3,90,00,000
हमीरपुर 318 21512 1,50,00,000
योग 892 92744 7,11,55,597
फसल बचाकर अवशेष अन्ना पशुओं को ही देंगे
बांदा। फसल बचाकर अवशेष अन्ना पशुओं को ही दिया जाएग, ताकि उनकी भूख मिटती रही। कैरी गांव में गोशाला के लिए जमीन देने वाले किसान शिवविलास पटेल का कहना है कि गांव के 99 फीसदी किसान खेतों में डेरा डाले हैं। अन्ना पशुओं के बारे में ग्राम प्रधान से सहयोग मांगा तो उन्होंने असमर्थता जता दी। अब ग्रामीणों के सहयोग से यह गोशाला चालू की गई है। सभी किसानों ने निर्णय लिया है कि तैयार हो रही धान की फसल कटने के बाद उसका पुआल गोशाला को ही दे दिया जाएगा। पशुओं के भरण पोषण के लिए सबके सहयोग से और भी योजना बनाई जाएगी। संवाद
25 फीसदी फसल चट कर जाते हैं अन्ना पशु
बांदा। बुंदेलखंड में अन्ना पशुओं से हर साल लगभग 25 फीसदी फसल नष्ट होती है। यहां की अन्ना प्रथा संसद से लेकर विधान सभा तक गूंज चुकी है। बुंदेलखंड भ्रमण पर आए मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ सार्वजनिक मंच से यहां की अन्ना समस्या को स्वीकार चुके हैं। सरकार ने कुछ योजनाएं भी लागू कर दी हैं। लेकिन हालात जस के तस हैं। बुंदेलखंड का लगभग हरेक गांव अन्ना पशु समस्या से घिरा हुआ है। बड़े पैमाने पर अन्ना पशुओं के कारण जमीनें परती पड़ी हैं।
मशीनों से दोस्ती, गोवंश से नाता तोड़ा
बांदा। समाजसेवी अरुण कुमार पटेल (कोर्रा खुर्द) बताते हैं कि बुंदेलखंड में यह प्रथा थी कि चैत्र मास में फसल कट जाने के बाद खाली खेतों में जानवरों को खुला छोड़ दिया जाता था। यह किसानों का कृषि ज्ञान था। खेतों में विचरण और चरने से पशुओं का गोबर व गोमूत्र खाद का काम करके खेतों की उर्वरा शक्ति बढ़ाता था, लेकिन अब किसानों ने मशीनों से दोस्ती कर ली और गोवंश से नाता तोड़ लिया। उधर, प्राकृतिक प्रकोप से भी फसलें घटीं तो चारा-भूसा भी कम होता चला गया। गांवों से चरवाहा भूमि खत्म हो गई। सरकार की योजनाएं कागजी ज्यादा हैं। संवाद
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