बांदा। तीन बच्चों की मौत और डेढ़ दर्जन बच्चों के
लहूलुहान होने से त्रिवेणी, चिलहेटा, भूरागढ़, बोधी पुरवा, दुरेड़ी आदि
गांव के हजारों लोग घटनास्थल पर जमा हो गए।
खून में लथपथ शव देकर
उत्तेजित हो गए। उन्हें शांत कराकर शव पोस्टमार्टम के लिए कब्जे में लेने
में प्रशासन और पुलिस अफसरों के पसीने छूट गए। कई ग्रामीणों के हाथों में
लाठी-डंडे थे।
उनके तेवर भांपकर अफसरों ने हेलमेट लगा लिए। जाम
स्थल पर पहुंचे अफसरों ने ग्रामीणों से नर्म लहजे में बातचीत की। एडीएम ने
भरोसा दिलाया कि मृतकों के परिजनों को मुख्यमंत्री राहतकोष से 10-10 लाख
रुपये मुआवजा दिलाने की सिफारिश करेंगे।
घायलों को भी मुमकिन मदद
दिलाई जाएगी। स्पीड ब्रेकर की मांग पर अफसरों ने उसी वक्त पीडब्ल्यूडी
अभियंता को बुलाकर ब्रेकर बनवाने का निर्देश दिया।
नगर पालिका
बांदा ईओ वीके श्रीवास्तव ने पालिका की जेसीबी से नजदीक के खेतों की मिट्टी
उठवाकर सड़क पर डालकर ब्रेकर बनवाना चाहा तो ग्रामीण भड़क उठे।
जेसीबी
को घेरकर रोक दिया। मांग की कि पक्का और स्थायी ब्रेकर बने। कुछ ही देर
बाद पीडब्ल्यूडी ने घटनास्थल पर ब्रेकर बनवाना शुरू कर दिया।
घर से स्कूल के लिए निकले मासूम सगे भाई रवि और अरविंद को एक पल में मौत ने लपक लिया। अब घर से लेकर स्कूल तक मातम है।
घटनास्थल
पर बच्चों की मां रामरती का करुण क्रंदन सुनकर लोगों की आंखें नम हो गईं।
रोते समय उसके मुंह से यही शब्द निकल रहे थे- बारह पाथर पूजे लाल भए रहैं,
दोऊ मुहि अकेला छोर कर चले गए। यही दो बेटे रामरती की पूंजी थे।
बेटों
से उसकी गोद सूनी हो गई। अब दो पुत्रियां सात वर्षीय पारुल और तीन वर्षीय
प्रांशी ही बची हैं। बालकों का पिता मजदूरी करता है। रवि सातवीं और अरविंद
छठवीं कक्षा का छात्र था।
जेल रोड स्थित केडी मांटेसरी स्कूल में पढ़ते थे। स्कूल की प्रधानाचार्य बीना गुप्ता भी घटनास्थल पहुंचीं और शोक जताया।
हादसे
में जान गंवाने वाला 12 वर्षीय रामू भी गरीब घराने का था। बांदा शहर के
क्योटरा मोहल्ले में सरस्वती ज्ञान गंगा मंदिर में रामू छठवीं कक्षा का
विद्यार्थी था।
पिता महेश्वरीदीन पाल सफाई कर्मी है। रामू की मौत
के बाद मां रामबाई और पिता महेश्वरीदीन पर शोक का पहाड़ टूट पड़ा। अब इनके
घर में सिर्फ 14 वर्षीय पुत्र रामसेवक और सात वर्षीय पुत्री लक्ष्मी ही बचे
हैं।
पिता का कहना है कि रामू पढ़ने में होशियार था। एक पिता के
नाते वह उसकी पढ़ाई पर पूरा ध्यान दे रहा था। साथ ही उम्मीदें बंधी थीं कि
बुढ़ापे में मां-बाप का यह कमाऊ पूत बनेगा।