ओरन कस्बे के कोआपरेटिव बैंक में घोटाले की रकम 3.7 करोड़ दोषी बैंक कर्मियों से वसूली जाएगी। लगभग एक वर्ष तक चली जांच के बाद यह फैसला लिया गया। इस प्रकरण में शाखा प्रबंधक और कैशियर पहले ही बर्खास्त किए जा चुके हैं। ‘अमर उजाला’ ने घोटाले की पहली खबर पिछले वर्ष 2017 में 22 अगस्त को प्रकाशित की थी। बाद में 35 लाख गबन की रिपोर्ट दर्ज होने पर 18 जनवरी 2018 को खबर प्रकाशित हुई।
जिला कोआपरेटिव बैंक के अधीनस्थ ओरन नगर पंचायत कोआपरेटिव बैंक ब्रांच में बैंक कर्मियों की मिलीभगत से घोटाले शुरू हुए थे। पुलिस ने जांच में पाया था कि खाताधारकों का पैसा कुछ चुनिंदा खातों में स्थानांतरित कर दिया जाता था। बाद में इसे निकाल लिया जाता था। ऐसे कुछ खाताधारकों में रविकांत, हिमांशु, रामविलास, प्रेम कुमार, रमाकांत और हरिहर कृपालु के नाम जांच में सामने आए। ये सब ओरन के हैं।
पांच सदस्यीय जांच टीम ने सात साल के रिकार्ड खंगालने के बाद लगभग 50 पेज की जांच रिपोर्ट दी थी। इसी के बाद इसी वर्ष 13 जनवरी को बिसंडा थाने में महाप्रबंधक प्रशासन उदरेश कुमार प्रजापति ने घोटाले की एफआईआर दर्ज कराई। बैंक प्रबंधक विजय कुमार शुक्ला और कैशियर नीरज त्रिपाठी तथा प्रभारी बैंक मैनेजर सर्वेश कुमार तिवारी को गबन का दोषी बताया था।
‘अमर उजाला’ में घोटाले की खबरें कई बार छपीं। इसी के बाद दो बैंक प्रबंधकों और कैशियर पर रिपोर्ट भी दर्ज हुई। बाद में उन्हें बर्खास्त भी कर दिया गया। प्रभारी प्रबंधक सर्वेश तिवारी को भी निलंबित किया जा चुका है। गबन की गई कुल रकम लगभग 3 करोड़ 7 लाख रुपये बताई गई है।
बैंक महाप्रबंधक आरके पांडेय ने बताया कि यह घोटाला वर्ष 2011 से वर्ष 2017 के बीच हुआ। बताया कि सहकारिता अधिनियम की धारा 58 के तहत दोषियों से गबन की रकम वसूली जाएगी। इसमें बैंक के पूर्व चेयरमैन और कई शाखा प्रबंधक भी कार्रवाई के दायरे में आ सकते हैं। महाप्रबंधक ने बताया कि ओरन ब्रांच आरोपी कैशियर नीरज त्रिपाठी के मकान में किराए पर लेकर चल रही है। अब इसे दूसरे भवन में स्थानांतरित करने की नोटिस शाखा प्रबंधक को भेजी गई है।